अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > कोई गड़बड़ करना मत

कोई गड़बड़ करना मत

कोई गड़बड़ करना मत

 

—चौं रे चम्पू! सवारी कहां ते आ रई ऐ तेरी?

—भोपाल से वाया रायबरेली।

—का हतो रायबरेली, भोपाल में?

—रायबरेली में एक कविसम्मेलन-मुशायरा था, लेकिन उन्होंने उसे नाम दिया, ‘फेस्टिवल ऑफ पोएट्री’। साथ में ‘जश्न-ए-अदब’ भी लिखा था, पर उर्दू में नहीं, अंग्रेज़ीमें। वहां तुम्हारे चम्पू को एक सम्मान मिला, ‘शान-ए-हिन्दी’, लेकिन ताम्र-पत्र भी अंग्रेज़ी में था। उससे हिन्दी की कितनी शान बढ़ी, मैं नहीं जानता। बहरहाल,आईटीआई नाम की जिस सरकारी टैली कम्युनिकेशन कम्पनी ने अपने प्रांगण में ये ‘जश्न-ए-अदब’ कराया था, उसमें हिन्दी-उर्दू के पन्द्रह कवि-शायर थे। एक शायरपाकिस्तान के भी थे, जनाब उज़ैर अहमद साहब। सद्भाव की अच्छी बातें कर रहे थे, लेकिन उनका एक शेर मुझे पच नहीं पाया। भारत पाक सम्बन्धों के सिलसिले मेंउन्होंने कहा, ‘मैं अपना संग फेंक दूं, तुम फेंको अपना तेग।’ संग माने पत्थर और तेग माने तलवार तो आप जानते ही हैं। चचा, मेरे दिमाग में पत्थर-तेग की सुंईं अटकगई। उनके हाथ में पत्थर है और हमारे हाथ में तलवार। ये भी कोई तुलना हुई? अच्छा हुआ कि उनके बाद डॉ. कुंअर बेचैन ने अपनी जो ग़ज़लें सुनाईं, उनमें दो शेर मेरेमतलब के निकल आए।

—कौन से सेर हते?

—एक शेर था, ’दुनिया ने मुझपे फेंके थे पत्थर जो बेहिसाब, मैंने उन्हीं को जोड़ के, कुछ घर बना लिये।’ दूसरा शेर था, ’उसने फेंके मुझपे पत्थर और मैं पानी की तरह,और ऊंचा, और ऊंचा, और ऊंचा उठ गया।’

—फिर का भयौ?

—दो-तीन हजार श्रोता रहे होंगे। मेरी बारी आई तो मैंने कहा कि आज मेरे लिए एक श्रोता बेहद महत्वपूर्ण हैं, पाकिस्तान के आदरणीय शायर जनाब उज़ैर अहमद साहब। उनकी शायरी की प्रशंसा करने के बाद मैंने सलाह दी कि वे अपने उस शेर में सुधार कर लें, क्योंकि डॉ. कुंअर बेचैन बता चुके हैं कि फेंके गए पत्थरों काउपयोग हमारा देश किस मानसिकता से करता है। पानी ऊंचा कर लेते हैं, घर बना लेते हैं, लेकिन ये बात ग़लत है कि हमारे हाथों में तेग रहती है। हमारे देश में तोअजमेर शरीफ़ में एक बहुत बड़ी देग रहती है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति भी वहां सद्भाव की खिचड़ी खाने आते हैं। हथियारों और चुनौतियों की भाषा न रहे तो बेहतरहोगा।

—तेरी जा बात पै तारी बजी हुंगी?

—अब मैं क्यों अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनूं चचा! कार्यक्रम के बाद उज़ैर साहब के साथ देर तक बातें होती रहीं। डाइनिंग टेबल पर टेलीफ़ोन नम्बरों का आदान-प्रदानहुआ। उसी दौरान मेरे स्मार्ट फोन में टिंग की ध्वनि हुई, यानी कोई नया ई-मेल आया। वह ई-मेल ऋषिकेश के कवि राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा का था। मेल में उनकीताजा कविता थी। मुझे इतनी हंसी आई कि उज़ैर साहब हैरान रह गए, पर कविता में हमारे देश का आंतरिक मामला था, इसलिए उनसे कोई चर्चा नहीं की।

—हमैं तौ सुनाय दै!

—देखा जाए तो कविता में थोड़ी उतरी हुई सी बात तो है, लेकिन आप पार्टी अकड़ और सरकार बनाने की शर्तों को लेकर बनाया हुआ रूपक शानदार है। जितनी याद हैबताता हूं, ’आओ मेरे साथ लेट लो, पर कुछ गड़बड़ करना मत। मैं तुमको जूते मारूंगी, ज़्यादा बड़-बड़ करना मत। साथ रहूंगी पर सारे इल्जाम तुम्हीं पर लगवाऊंगी। तुम चकले में तबला पीटो, मैं केवल गाने गाऊंगी। मैं जो भी आरोप लगाऊं, ‘हां’ कहना, ’ना’ करना मत। हास्य-व्यंग्य की इस कविता में आग बहुत है डरना मत! आओ मेरे साथ लेट लो, पर कुछ गड़बड़ करना मत!!’

—बात तौ ठीक ऐ, पर तेरे म्हौं ते अच्छी नायं लग रई।

—तो चचा! मैंने कौन सी लिखी है ये कविता! अकेले में आपको सुनाई है, सबको थोड़े ही सुनाई है। पर ये राजेन्द्र बहुगुणा जी हैं दिलचस्प आदमी। हर दिन कविताएंलिखते हैं, फोन पर बता रहे थे कि पिछले छब्बीस साल में दस-हजार से ज्यादा कविताएं लिख चुके हैं। अगर इनकी मुलाक़ात उज़ैर साहब से हो जाती तो पत्थर औरतेग पर पच्चीस-तीस कविताएं लिख मारते। आप पार्टी पर तो आजकल हर घंटे लिख रहे हैं।

—भोपाल में क्या भयौ?

—उज़ैर साहब का फोन आ रहा है, चचा! शायद अमृतसर से लहौर की फ़्लाइट में बैठने वाले होंगे। भोपाल के किस्से बाद में।

 


Comments

comments

Leave a Reply