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किसमें ताक़त है देश को जोड़ने की

किसमें ताक़त है देश को जोड़ने की

 

—चौं रे चम्पू! रामलीला मैदान में अन्ना के आन्दोलन के दौरान सबते अच्छी चीज का भई?

—चचा! तुम सबसे बुरी बात सुनने को तैयार नहीं हो क्या?

—ना! सबते बुरी सुनिंगे ई नायं! कोई नायं सुनैगौ। नक्कारखाने में तूती की आवाज है जायगी। तू तौ सबते अच्छी बात बता।

—सबसे अच्छी बात ये हुई चचा कि हिन्दी की जय हुई। इस देश को किसी भी मुद्दे पर अगर एक करना है तो उसकी भाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती, हिन्दी ही होगी। ये बात सरकार में पक्ष के और विपक्ष के सभी दलों को समझ लेनी चाहिए कि अटक से कटक तक और गौहाटी से चौपाटी तक, भाषाई आधार पर, सभी को आन्दोलित करने वाली, जनलोक को एकत्र करने वाली, भीड़ को बटोरने वाली और लोगों को जोड़ने वाली अगर कोई शक्ति हो सकती है तो वो है हिन्दी। महाराष्ट्र के अन्ना हजारे ने अपनी मराठी का छौंक लगाकर जो भाषा बोली वो हिन्दी थी। उन्होंने लुटेरे को लुटारे कहा, तो ये मराठी का प्रभाव था, और इस प्रकार हिन्दी एक शब्द से समृद्ध हुई। देश की विविध भाषाओं, लोकभाषाओं और बोलियों से हिन्दी को ताक़त मिलती है। अपनी सहोदरा भाषाओं से शब्द लेकर हिन्दी समृद्ध होती है। अन्ना हजारे की हिन्दी से मराठी का स्पर्श पाकर मानक कही जाने वाली हिन्दी बहुत खुश हुई होगी क्योंकि उसने स्वयं को व्यापक स्तर पर भारतीय भाषा बनाया।

—दक्खिन में कहां पौंहची?

—वहां भी पहुंची चचा। इसका श्रेय आंदोलन को कवर करने वाले मीडिया को देना चाहिए। दक्षिण भारतीय प्रांतों में, जहां समझा जाता है कि हिन्दी कोई नहीं समझता। वहां इस आन्दोलन के दौरान हिन्दी चैनलों की टीआरपी बढ़ी है। हालांकि दक्षिण भारतीय राज्यों के लोकल टेलीविजन नेटवर्क संतुलित और सधी हुई स्थितियां दिखाते रहे। केवल अन्ना-अन्ना नहीं किया उन्होंने। उन्होंने सरकार का पन्ना भी खोला और लोकतंत्र और संविधान को भी सामने रखा, लेकिन जो अन्ना के समर्थक थे या इस आन्दोलन से कोई जुड़ाव महसूस करते थे उन्होंने हिन्दी के चैनल देखे। तो हिन्दी गई, प्यारी हिन्दी गई कानों में। ये मेरे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी की बात है। वहां क्या भला-बुरा बोला गया, इसकी समीक्षा तो प्रशंसक-निन्दक करते रहेंगे, लेकिन फिल्म अभिनेता हों, या न्यायाधीश, वकील हों या भूतपूर्व पुलिसकर्मी, गायक हों या अपनी-पराई कविताएं सुनाने वाले कवि, चाहे सरकार के पक्ष या विपक्ष का कोई व्यक्ति वहां गया हो, सबने हिन्दी बोली।

—जे बात तौ ठीक ऐ तेरी।

—इससे सरकार को शिक्षा लेनी चाहिए। अगर राहुल गांधी ने अंग्रेजी के लिखित व्याख्यान के स्थान पर हिन्दी में वही उदगार प्रकट किए होते तो जनता तक अपनी बात पहुंचा सकते थे। ये भ्रांति है कि आज का पढ़ा-लिखा नौजवान अब अंग्रेजीदां हो गया है। अगर उसने गांधी टोपी लगाई और झण्डा लहराया है तो वह हिन्दी से भी मौहब्बत करता है। चौदह सितम्बर को हिन्दी दिवस आने वाला है। हमारे तंत्र और हमारी सरकार द्वारा उसको एक औपचारिक जामा पहनाकर सम्पन्न किया जाएगा। इस आंदोलन से सभी को सीख लेनी चाहिए कि हिन्दी से व्यापकतम संवाद स्थापित होता है। बात जन-जन तक पहुंचती है।

—हां गुजरात के महात्मा गांधी ऊ हिन्दी की बकालत कर्ते ए!

—आज़ादी की लड़ाई में उनसे गुजराती मिश्रित हिन्दी सुनने को मिली थी। महात्मा गांधी ने स्वयं कहा था कि अगर हमारे देश का लोकतंत्र ग़रीबों, मुफलिसों, वंचितों और शोषितों का पक्षधर है तो हमारे देश की भाषा हिन्दी होगी। आज के हुक्मरानों को चाहिए, अगर उनमें सच्चाई है, तो देश से बात करते समय हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करें। हिन्दी बोलते-बोलते अन्ना के चेले भी अगर सरकार बनाते हैं, सत्ता में आते हैं चचा तो अंग्रेजी बोलना चालू कर देंगे। उस दिन मुझे दुख होगा।

 


 


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