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ख्वाजा सुन अरदास ये लगाई

ख्वाजा सुन अरदास ये लगाई

 

—चौं रे चम्पू! बता पिछली जात्रा कहां की भई तेरी?

—अजमेर गया था, ऐन उसी दिन, जिस दिन वहां ज़रदारी साहब दरगाह पर चादर चढ़ाने गए थे। भला हुआ कि शताब्दी एक्सप्रेस दो बजे से पहले अजमेर पहुंच गई, बताया गया कि दो बजे से लेकर ज़रदारी जी के लौटने तक अजमेर की मुख्य सड़कों को आवागमन के लिए बन्द कर दियाजाएगा। आयोजक कवि रासबिहारी गौड़ स्टेशन पर लेने आ गए थे!

—बड़े सहनसील लोग ऐं अजमेर के!

—अजमेर क्या! पूरे राजस्थान के लोग दरसल मेहमाननवाज़ होते हैं। तकलीफ़ सहकर भी आतिथ्य निभाते हैं। दूसरी बात यह कि अजमेर की दरगाह में हिन्दू और मुसलमान दोनों की आस्था है। वह साम्प्रदायिक सद्भाव की पुण्य-स्थली है, इस नाते भी अजमेरवासी कोई परेशानी महसूस नहीं कर रहे हैं, ऐसा मुझे लगा। बहरहाल, पिछली रात महावीर जयंती के कार्यक्रम में सुबह तक जागा हुआ था, शताब्दी में कमर सीधी होती नहीं, लगा रहा अपने आईपैड पर। अब सोना चाहता था। मैंने रासबिहारी से कहा, ‘भैया अगर तीन-चार घंटे सो लूंगा तो शाम को अपनी कविता से लोगों कीचेतना को जगा पाऊंगा अन्यथा मेरी कविता ही मंच पर सोती रहेगी। भोजन कराने के बाद तीन बजे से छः बजे तक सोने देना।’ वे बोले, ‘नहीं भाईसाहब! साढ़े चार बजे प्रेस को समय दिया है, पत्रकार आएंगे।’ मैंने सोचा चलो पुरानी शवासन टैकनीक से काम चला लेंगे। मेरा अपना अनुभव है किदस मिनट का शवासन दो-तीन घंटे की नींद के बराबर होता है। ख़ैर चचा, भोजन के दौरान रासबिहारी को किसी पत्रकार ने फ़ोन पर बताया कि छः बजे से पहले पत्रकार नहीं आ सकते, सड़कें बंद रहेंगी। मैं अंदर ही अंदर ख़ुश! अंतिम ग्रास तक तो मुझे नींद के झोंके आने लगे। कमरे में आकरलम्बी तान कर सो गया।

—नींद पूरी भई?

—सुनो तो सही! साढ़े चार बजे के क़रीब निर्मम घंटी बजी। मैंने अर्धसुप्तावस्था में चिटकनी खोली। सामने दो पत्रकार खड़े थे। मैंने कहा ‘दोस्त भयंकर नींद में हूं, बगल के कमरे के कवि पिछली रात भरपूर सोए हैं, उनसे बात कर लीजिए!’ एक पत्रकार बोले, ‘जी हमें तो आपका ही साक्षात्कारलेना है।’ मैंने हैरानी जताई, ‘आप लोग आ कैसे गए छः बजे से पहले?’ बोले, ‘पुलिस को चकमा देकर!’ मैंने अनुरोध किया, ‘बंधुओ, मैं दो रात से सोया नहीं हूं, अभी ये आपका मेरे ऊपर अन्याय होगा।’ दूसरे सज्जन बोले, ‘अगर आपने हमें लौटाया तो ये हमारे ऊपर आपका अन्याय होगा।’ मैंनेअनमनाते हुए उन्हें अन्दर बुला लिया और थोड़ी सी खुंदक में उनके सवालों के ऊटपटांग जवाब देने लगा, ‘आप पूछ रहे हैं शाम को क्या सुनाऊंगा,

अरे, जो मन में आएगा सुनाऊंगा। ये कोई पत्रकारिता की नैतिकता है? वहां आइए, सुनकर रिपोर्ट बनाइए!’

एक पत्रकार बोला ‘आप नींद में जवाब देरहे हैं सर! सो जाइए!’ अब तक आंख खुल गई थीं। मैंने हंसते हुए उनसे पूछा,

‘ज़रदारी के आने से कोई परेशानी तो नहीं हुई?’ बोले, ‘परेशानी! त्राहि-त्राहि कर रहा है अजमेर। दो दिन से रिहर्सलें चल रही हैं।

नकली ज़रदारी को हैलीपैड पर किशनगढ़ उतारा गया। वहां से नकली काफ़िला आया।सारी जनता को असली कष्ट दिया गया। कोई रेल्वे स्टेशन पर इंतजार करता पड़ा रहा, कोई बस अड्डे पर। किसी को प्रसूति के लिए जाना था। किसी को डॉक्टरी सहायता नहीं मिली। लेकिन पुलिस के आगे किसकी चले! हम भारतवासी बस सहना जानते हैं।’ चचा, अब मेरे ज़ेहन में कविता घुमड़नेलगी।

—का कविता घुमड़ी?

—ब्रज की एक लोक धुन पर उन पत्रकारों के सामने आशुकवि हो गया। गाना शुरू किया, ‘ज़रदारी नै चदरिया चढ़ाई बहना, जरदारी नै! देखी देर न सबेर, दुखी कियौ अजमेर, खाकी वर्दी ने अपनी चलाई बहना,

ज़रदारी नै….। आयौ हौ तौ सीधौ आतौ, जाके सीस तू नवातौ, फिर काहे कूंरिहर्सल कराई बहना? ज़रदारी नै… ।’ मैंने पत्रकारों से कहा, बस महाराज, इसी को छाप देना, अब जाओ। शाम को कविसम्मेलन हुआ। पता चला कि ज़रदारी साहब दरगाह में नौ करोड़ के दान का ऐलान करके गए हैं। मैंने मंच पर गीत का अगला अंतरा भी बना दिया।

—सो का बनायौ लल्ला।

—लै लै हम्ते सौ करोड़, पर बम्म मती फोड़! ख्वाजा सुन, अरदास ये लगाई, बहना…

—खूब कही पट्ठे, खूब कही!

 

 


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