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ख़ून सड़क पर नहीं बहे

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ख़ून सड़क पर नहीं बहे

(सवाल इतना-सा है कि व्यर्थ मरण क्यों हो?)

एक मरे, दो मरें, दस मरें

सौ मर जायं, हज़ार मरें,

है सवाल इतना-सा भैया

क्यों वे आख़िरकार मरें?

एक जान की भी क़ीमत है

व्यर्थ मरण दुखदाई है,

कुछ ज़ालिम लोगों ने लेकिन

संवेदना सुखाई है।

इतने यहां, वहां पर उतने

घेर लिया मन को दु:ख ने,

उधर मुंबई में तो भैया

चले गए हैं कई गुने।

इन संख्याओं को सुनकर भी

हृदय नहीं हिल पाता क्यों,

फिर सवाल करता हूं ख़ुद से

यह सब यों झिल पाता क्यों?

दानव तो कल भी दानव थे

और आज भी दानव हैं,

इस पर रोक लगाकर फ़ौरन

सिद्ध करें हम मानव हैं।

चिड़िया बैठी गुरुद्वारे पर

गिरजा, मंदिर, मस्जिद पर

लेकिन क्यों जमकर बैठे हो

अड़े हुए अपनी ज़िद पर।

गिरजा, गुरुद्वारे ये मंदिर

मस्जिद सभी हमारे हैं,

कहना है तो कहें गर्व से

हिंदुस्तानी सारे हैं।

इनको कौन बताए आख़िर

इतना इनसे कौन कहे,

ख़ून धमनियों में ही दौड़े

ख़ून सड़क पर नहीं बहे।


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1 Comment

  1. sunita patidar |

    आतंकवाद भारत की बहुत ही बड़ी समस्या है सही कहा मानव अपनी मानवता खोते जा रहा है

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