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    कटोरदान में इगलास की चमचम

    —चौं रे चम्पू! छुट्टीन में कहां जाय रह्यौ ऐ?

    —चचा, अपनी तो तीन सौ पैंसठ दिन छुट्टी हैं और तीन सौ पैंसठ दिन काम। ऐसा नहीं है कि गर्मी आईं तो छुट्टी कर लो। हां, पहले ऐसा होता था। यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे, परीक्षा हुईं, परिणाम निकाला, गर्मियों में सर्दियों का सामान निकाला, रेल का टिकिट निकाला और नहीं तो गाड़ी को निकाला और चल दिए।

    —कहां चल दिए?

    —चल दिए फागू।

    —बचपन ते फागू जाय रह्यौ ऐ का?

    —नहीं, बचपन में जाया करते थे कर्णवास। छुट्टियां आते ही अपनी ननसाल इगलास की याद आने लगती थी। नाना जी कर्णवास, राजघाट, कलकत्ती, नरौरा जाने के लिए पूरी तैयारी करते थे। एक कनस्तर में लड्डू भरे जाते थे। दूसरे कनस्तर में दूध के आटे की पूरी और दाल की कचौड़ियां। हंडिया में घी। छोटे टीन में बूरा। कटोरदान में इगलास की चमचम। मथुरा से आने वाली बस में अलीगढ़ तक गए। वहां से दूसरी बस बदली राजघाट की। फिर इक्का लिया टमोटिया की धर्मशाला तक। धर्मशाला में नाना जी की सैटिंग रहती थी। एक कमरा पूरे बीस दिन के लिए उनको मिल जाता था। छोटा सा कमरा सामान रखने के लिए था, सोते तो बाहर ही थे। भूख लगे तो कनस्तर, टीन या कटोरदान, कुछ भी खोलो। प्यास लगे तो गंगाजल। गंगाजी से घड़े में पानी भर कर लाते थे। आगे तक तैर कर जाते थे। किनारे का पानी नहीं लेते थे। पता नहीं किसके नहाने के जीवाणु किनारे पर टहल रहे हों। घड़ा भी तैरने में उपयोगी रहता था, जल में जाते वक़्त उस पर चढ़कर तैरते थे। भरा मटका लेकर उधर से लौटे, पांव चलाते हुए आ गए। ध्यान रखते थे कि घड़े के पानी में किनारे की बूंदें न पड़ जाएं। घाट से थोड़ा हट कर निकलते थे।

    —तैरनौ कौन्नै सिखायौ?

    —जीने की इच्छा ने। खुर्जा में एस. एम. जे. ई. सी. इंटर कॉलिज से ज़रा सा आगे एक बम्बा था। हौलट, हीरा, वीरू, चुन्ना और प्रदीप के साथ मैं भी जाया करता था नहाने। सम्पूर्ण कपड़े उतार कर सम्पूर्ण टोली उथले जल में नहा कर कक्षाओं में पहुंच जाती थी। एक बार दुस्साहस किया। बम्बे के स्रोत पर पहुंच गए। लोहे के संकरे चौकोर रास्ते से निकलना एक चुनौती था। किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी। पता नहीं किसने किसको धक्का दिया। तेज़ जल-प्रवाह में चौड़ी चौकोर पाइप के आंतरिक नट-बोल्टों से टकराते हुए बहे जा रहे थे। किसी तरह सांस रोकी। दम घुटने लगा। धीरज टूटता उससे पहले पानी ने दूसरी तरफ ला पटका। ऊंचाई से पानी में गिरे पर इस बीच फेंफड़ों को सांस मिल गई। किनारा दूर था… पता नहीं कैसे जा लगे। बस थोड़े-से हाथ-पैर चलाए थे और खुद को पानी के हवाले छोड़ दिया था। तैरना आ गया। फिर तैरे मेरठ की राम वाटिका की बड़ी हौदी में।

    —मेरठ में कौन हते?

    —ताऊजी डॉ. कृष्णचन्द शर्मा। कुरु लोक संस्थान के जनक। परम विद्वान ताऊजी! लोक साहित्य पर सतत शोध करते रहते थे। उतना सुन्दर हस्तलेख मैंने आज तक किसी का नहीं देखा जितना उनका था। मेरे पिता का हस्तलेख उनके जैसा ही था। और मेरा मेरे पिता जैसा। कुछ छुट्टियां उनके यहां बीतती थीं मेरठ में। बेगम पुल तक मैं उनके साथ टहलने जाता था। वे गुरु-गम्भीर रहते थे। लोग उनसे बहुत सहम कर बात करते थे। खूब आदर था उनका। किसी के घर ले जाते थे तो मेरी कविताएं सुनवाते थे। रास्ते में कुछ ऐसे सवाल पूछते थे जिनका ओर-छोर मुझे पता नहीं होता था, पर में उत्तर ज़रूर देता था।

    —वो आदत तौ तेरी गई नायं?

    —राम वाटिका के पास ही नानकचन्द कॉलेज है। गेट के पास इमली का पेड़। बहुत इमली तोड़ी हैं चचा! घर के पिछवाड़े एक आम का पेड़ था। छत पर चढ़ जाओ, आम पाओ। अमिया की डाली जैसे तुम्हारे लिए ही झुकी हो। कुछ अमिया तोड़ के भाभी को चटनी के लिए दे दीं, दो-चार काटकर नमक के साथ खाईं। खुद खाईं और ताऊजी के घर छुट्टियां बिताने आए अपने हमउम्र बच्चों को खिलाईं। क्या मज़े थे!

    —एक कटोरदान में इगलास की चमचम तौ मंगा चम्पू। बड़ी स्वादिष्ट होंय।

     

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