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कस्बाती से शहराती हुई कानाबाती

कस्बाती से शहराती हुई कानाबाती

 

—चौं रे चम्पू! पुस्तक मेला आइबे वारौ ऐ, लोकार्पनन की बहार रहैगी, तू जायगौ?

—चचा, लोकार्पणों की बहार तो आ चुकी है। अब लोकार्पण नहीं, ’बुक लॉन्च’ कहा जाता है। पेंगुइन द्वारा प्रकाशित पंकज दुबे का पहला उपन्यास एक साथ दो भाषाओंमें लॉन्च हुआ। दिल्ली में हुए लॉन्चार्पण में मैं भी गया था। उपन्यास का हिन्दी में नाम था ‘लूज़र कहीं का’ और अंग्रेज़ी में ‘व्हाट अ लूज़र’। बहुत पुस्तकलॉन्चार्पण देखे मैंने, लेकिन ऐसा पहली बार देखा।

—चौं, ऐसी का बात हती?

—वातावरण यारबासी की महफ़िल जैसा अनौपचारिक था। ठहाकों की बहार थी। पुस्तक प्रमोशन के लिए पहले एक दिलचस्प सांगीतिक वीडियो दिखाया गया। मैंने उपन्यास अंग्रेज़ी में नहीं, हिन्दी में पढ़ा था। पंकज को मैं पिछले सात-आठ साल से जानता हूं। सन दो हज़ार सात में हम लोग न्यूयॉर्क में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में साथ-साथ गए थे। वहां मैंने हर दिन ‘सम्मेलन समाचार’ नामक समाचार बुलेटिन निकाला था। पंकज सम्पादकीय टीम के अप्रकट अंग थे। संवाददाता के रूप में सुगठित रिपोर्ट बनाकर चुपचाप दे जाते थे। चचा, मुझे नहीं पता था कि इस शख़्स के अन्दर एक अद्भुत कहानीकार छिपा हुआ है। आगे भी संगत होती रहीं। मैं उनकीफ़िल्म ’नाच गणेश’ देख कर पहली बार चौंका। वृत्तचित्रों के व्याकरण को तोड़ती हुई फ़िल्म थी। दो साल पहले पंकज दुबे और प्रशांत कश्यप ने मुझे ‘जागरण फ़िल्म फ़ेस्टिवल’ की जूरी का चेयरमेन बना दिया। दो साल तक मैंने फेस्टीवल के लिए आई अनेक फिल्में देखीं। जागरण-ढंग से निर्णय लिए गए, अच्छी फिल्मों को अवॉर्ड मिले।

—फिल्मन्नैं छोड़, किताब की बात कर।

—किताब तो, पता नहीं तुम्हें कैसी लगेगी, क्योंकि नए ज़माने के युवाओं की, नई बदलती हवाओं की, समकालीन फिज़ाओं की झकाझक झांकी है इसमें। मैंने कुछ ही उठक-बैठकों में पढ़ डाली। ‘रागदरबारी’ के बाद इस उपन्यास ने एक ताज़ा और खटमिट्ठा ‘माज़ा’ पिला दिया। तथाकथित हिंग्लिश में हास्य-व्यंग्य का बिंदास भाषाई इस्तेमाल। मैंने पंकज से पूछा कि भैया तुमने ये उपन्यास पहले हिंदी में लिखा या अंग्रेज़ी में? उन्होंने बताया कि सोचा तो पूरा हिन्दी में, पहले दो अध्याय हिन्दी मेंलिखे, फिर मार्केटिंग के मद्देनज़र अंग्रेज़ी में लिखने लगा, फिर हिंदी पर आ गया। है न दिलचस्प!

—और का दिलचस्प रह्यौ जे बता।

—लॉन्चार्पण में भी अभिनेता विनय पाठक ने दो अध्याय हिन्दी में सुनाए, अभिनेत्री सारिका ने दो अध्याय अंग्रेज़ी में। एंकर रवीश कुमार ने कहा कि ये कहानी बिहारसे आए हम सब युवकों की कहानी है। चचा, पंकज दुबे हर स्थिति के लिए परस्पर मेल न खाती हुई सी समताएं-उपमाएं ढूंढ लाते हैं। बेगूसराय से अपने लोहे के बक्सेमें सत्तू, अचार और डिक्शनरी लेकर आए पांडेय अनिल कुमार सिन्हा ने दिल्ली आते ही अपना नाम शॉर्ट में पैक्स रख लिया। उनकी एक बलवती तमन्ना थी कि एकदूधिया गोरी पंजाबी लड़की के साथ सोना है। ‘पैक्स के बाबूजी अपने खानदानी नाम, टाइटल सबके शॉर्ट फॉर्म बन जाने से काफी हर्ट हुए, उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी मालदा आम का आम-पापड़ बना दिया हो’। उपमाओं का इस्तेमाल बख़ूबी से ख़ूब हुआ है। कुछ और उदाहरण देता हूं, ‘गोरी लड़की से बात करने के आइडिया से ही पैक्स के रौंगटे चौकीदार की तरह खड़े हो जाते थे’। ‘नौ सौ निन्यानवै पोस्टर लगाते तक पैक्स चाय में देर तक डूबे हुए बिस्कुट की तरह हो गया था, कभी भी चाय में गिर जाने वाला, अगर मुंह में झट से न डाल दिया जाए तो’। ‘सुबोध सिंह दोनों टांगों को ऐसे फ़ाड़कर बैठा था, जैसे ढाबों में मुर्गा तंदूर होता है’।

—कहानी में रफ़्तार हतै?

—नए मसाले की फ़िल्मों जैसी तेज़ रफ़्तार है। गिने-चुने पात्र हैं। सुबोध सिंह, मयंक, निशांत, रौनी, बिंदिया बब्बर, राणा और भडाना, ये सभी विद्यार्थी राजनीति करते हुए और अपनी युवा कामनाओं के स्वच्छंद लोक को उतार-चढ़ाव के साथ उजागर करते हुए टेंशन और अटेंशन में रहते हैं। सत्तर के दशक के छात्र आन्दोलनों पर काशीनाथ सिंह का  उपन्यास ‘अपना मोर्चा’ भी पढ़ा था। उसमें वैचारिक संघर्ष गाथाएं थीं, यहां विचारों का कोई ख़ास संघर्ष नहीं है। ये कहानी, महत्वाकांक्षी औरदीवानी जवानी के चरमराते कैरियर-स्वप्नों की, कस्बाती से शहराती होती हुई, बिहारी अंदाज़ की कानाबाती है, जो महानगर में कुर्र का सा आनंद दे सकती है।

 


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