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कपूर साहब की अंतिम अरदास

कपूर साहब की अंतिम अरदास

 

—चौं रे चम्पू! सिर पै रूमाल बांधि कै कहां ते चल्यौ आय रह्यौ ऐ?

—चचा, कपूर साहब की अंतिम अरदास के लिए गुरुद्वारे गया था। पहली बार गुरुद्वारे में इतनी देर बैठा। तन्मय होकर गुरबानी सुनी। भजन सुने, अन्दर तक सुरों का झरना बहता रहा और कपूर साहब की याद आती रही।

—कौन कपूर साब?

—के. के. कपूर! तेईस साल से मेरे पड़ौसी थे। एकदम अगल-बगल। सुबह-सुबह सैर को जाएं, सर्दियों के दिनों में धूप सेकने के लिए निकलें या अख़बार लेने के लिए, कपूर साहब के मुस्कानपूरितदर्शन होते थे। सच कहता हूं चचा जब कोई ऊपर चला जाता है, तभी उसके गुण याद आते हैं, जीते जी उसकी महत्ता समझी नहीं जाती।

—तौ बता उनकी महत्ता।

—महत्ता ये थी कि महत्ता कभी चाही नहीं। चाहा तो सबका भला। जो किया सबके भले के लिए किया। उनको मैंने कभी ऊंचे स्वर में बोलते नहीं सुना, कभी किसी से झगड़ते नहीं देखा। वे लगभग दस वर्ष तक हमारी जे पॉकेट की एसोसियशन के प्रधान रहे। प्रायः सर्वसम्मति से चुने जाते थे। सबकी बातें सुनते थे। ऐसा नहीं कि सबकी शिकायतें दूर कर पाते हों, लेकिन जितना कर पाते थे, करते थे। कॉलोनी में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो एसोसियशन का मासिक चंदा नहीं देते, उनसे कोई शिकायत नहीं। जो देते हैं, उनको धन्यवाद ज़रूर देते थे। कोसना उन्होंने कभी नहीं सीखा। शिष्ट, सौम्य, मितभाषी! और सबसे बड़ा गुण था उनका, सहनशीलता। डीडीए की इन बहुमंज़िला इमारतों वाली कॉलोनियों में जो प्रथम तल पर रहता है, उसके ऊपर आकाश नहीं, बल्कि तीन-चार मंज़िलें होती हैं। छत पर नीचे वाला कोई तभी जाता है जब टंकियों का पानी ओवरफ्लो करे या टीवी का एंटीना चैक करना हो। चचा, ऊपर की हर मंज़िल से टंकियों के पानी के अलावा जो भी कुछ गिरता है, निर्माण कार्य, सफाई, पुताई या बच्चों के खेल के कारण, नीचे वाले के आंगन में आता है। मैंने बहुत सारे प्रथम तल रहवासियों को उत्तेजना के क्षणों में गरजते देखा है, लेकिन कपूर साहब कभी उत्तेजित नहीं हुए। कोई काम की चीज गिरी तो सीढ़ियां चढ़कर ऊपर देने चले गए। कूड़ा गिरा तो सौम्यता से फिंकवा दिया। परेशानी हो या आनन्द, मुझे उनका एक जुमला याद आता है…

—कौन सौ जुमला?

—ओ माई गॉड! सुख हो या दुख हो, हास्य-विनोद के क्षण हों या व्यंग्य से भरी अभिव्यक्ति, ‘ओ माई गॉड’ कहने का तरीक़ा बदल जाता था, टोन बदल जाती थी। दुख में कहेंगे तो सिर को झुकाकर। सुख में कहेंगे तो मुस्कान खिलाते हुए सिर को उठा कर। व्यंग्य में कहेंगे तो आंखों को तिरछा करते हुए। विस्मय में कहेंगे तो आंखें चौड़ी करके। हास्य में कहेंगे तो आंखें छोटी करके खिलखिलातेहुए। पर दीवाली के दिन उनके ’ओ माई गॉड’ को समझना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होता था।

—सो कैसै?

—बड़ी नफ़ासत से अपने तीन पत्ते देखने के बाद उनके मुंह से जो बेसाख़्ता ‘ओ माई गॉड’ निकलता था, उससे कुछ भी पता लगाना असंभव होता था। क्योंकि उसमें कोई भंगिमा ही नहीं होती थी। कोई जज नहीं कर सकता था कि उनके पास कमज़ोर पत्ता है या बड़ा। हार जाते थे तो कोई ग़म नहीं, जीत जाते थे तो बच्चों में बांट देते थे। उनके ‘ओ माई गॉड’ जैसा ही उनका व्यक्तित्व था, पता लगाना बड़ा मुश्किल था कि वे कमजोर क्षणों को जी रहे हैं या प्रसन्न क्षणों को। ऐसे कपूर साहब की अंतिम अरदास हुई। रागी जी बड़ी ही सुरीली वाणी में गा रहे थे,  प्राणी क्या मेरा क्या तेरा, अपने करम की गत मैं क्या जानूं बाबा रे। उनके कर्मों की गति वे न जानते हों, लेकिन पूरा जे पॉकेट जानता है कि उन्हीं के कारण बगल वाला पार्क गुलो-गुलज़ार है, उन्हीं के कारण गली में बत्तियां लगी हुई हैं, उन्हीं के कारण साफ-सुथरी रहती हैं नालियां, उन्हीं के कारण चौकीदार चौकस रहते थे। चचा, जब कोई चला जाता है तब हम दार्शनिकों सी बातें करते हैं, प्राणी क्या मेरा क्या तेरा?लेकिन कपूर साहब का ये दार्शनिक चिंतन पूरे तेईस वर्ष तक मैंने देखा है। कोई अपना-पराया उनके लिए था नहीं। मैं उस आम नागरिक को पूरे देश की ओर से श्रद्धांजलि देता हूं जो सचमुच एक बहुत बड़ा इंसान था।


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