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कम नहीं है जड़ों की महत्ता

kam nahee hai jadon kee mahattaa

 

 

 

 

 

 

 

 

कम नहीं है जड़ों की महत्ता

(धरती की पूरी गोलाई पार करके जड़ें दूसरी ओर एक उड़ान में बदल जाती हैं)

 

 

किसी अनाहूत गर्जन से

घनीभूत लोहे लंगड़ से,

अंधे बहरे कोहरे से

शोर करते अंधड़ से,

कोमल की भयंकर मुस्कान से

गोल गली के आख़िरी मकान से,

वर्तमान विद्युल्लताओं के

जटिल जंजाल से,

इतिहास के कुटिल कंकाल से,

न तो रुकती है

संकल्पधर्मी उड़ान,

न होता है समय के रथ

के लिए कोई व्यवधान।

न वृक्ष की कोई नस दूखती है,

न उसकी कोई जड़ सूखती है।

 

मान लो समय का कोई पहिया

गुस्से में ऐंठ जाए,

या कोई उड़ान थककर

डाल पर बैठ जाए,

तब जड़ें ख़ुश होती हैं अपने कृतित्व पर,

वृक्ष के अस्तित्व पर।

 

लेकिन यदि

पहिए की अगतिक ऐंठ जाए नहीं,

और डाल पर सुस्ताती

उड़ान को और उड़ना भाए नहीं,

तब जड़ों को होती है बहुत बेचैनी,

चेतना हो जाती है कठोर और पैनी।

उसके कोमल रेशे कुलबुलाते हैं,

धरती के नीचे बढ़ते ही जाते हैं

और पार कर जाते हैं

धरती की समूची गोलाई

और दूसरे छोर पर निकलकर

एक उड़ान में बदल जाते हैं।

 

हां, बड़ी, बहुत बड़ी होती है

आकाश की सत्ता,

पर इससे कम नहीं होती

जड़ों की महत्ता।

 


Comments

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5 Comments

  1. सर बहुत ही प्रभावशाली और काफ़ी कुछ सोचने को विवश कर देने वाली कविता—- हेमन्त कुमार

  2. हाँ सच है एक उड़ान में बदल जाते हैं………..और बढाते है पेड़ का अस्तित्व …
    शानदार ………

  3. Apurva Swapnil |

    Kuch Shabd aap ki lekhani ko pakar sunane me vo ahsas dete hai jo prathak ho kar nahi milta. ………. Kavita Jado ki sanvednao par dhayna aakrasht karti hai… aoor uska mahatma, jo dharti ke undar dabe hone ke bavjud kam nahi hota, dikhati hai…….. Dhanyavad is kavita ke liye

    • प्रिय अमितेश और अपूर्व आपके अन्दर भी जड़ों के रेशे उड़ने लगे… अच्छा है!

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