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कला में जो हो जाए सो थोड़ा

कला में जो हो जाए सो थोड़ा

 

—चौं रे चम्पू! है आयौ तू जयपुर साहित्य के मेला में?

—हां, हो आया! अब तो उसकी यादें भी धुंधली पड़ने लगीं। जो वहां नहीं था, वही वहां था। सलमान रुश्दी! उसके बाद तो मैं एक और मेले में हो आया चचा।

—कौन से मेला में है आयौ?

—इंडिया आर्ट फेयर। आजकल वही दिमाग़ पर हावी है। उपस्थिति में जाने क्या-क्या अनुपस्थित। अनुपस्थिति में न जाने क्या-क्या उपस्थित। शब्दों की दुनिया से निकलकर दो-तीन दिन के लिए रंगों की दुनिया में आ गया और मुझे लगा कि अपने मन की बात कहने का माध्यम रंग ज़्यादा हैं, शब्दकम। चाक्षुष अभिव्यक्तियों में आपत्तियां भी कम होती हैं। शब्द अनेकार्थी होने के बावजूद चुभता या सहलाता है, रंग और आकृतियां हमारी चाक्षुष-चेतना के लिए, हमारा अपना लोक खोल देती हैं। इस मेले में तरह-तरह के सपने टंगे हुए थे।

—ऐसौ का खास देखौ?

—नए-पुराने कलाकारों के नए-पुराने काम देखने का मौक़ा मिला। न जाने कितने प्रसिद्ध लोगों के प्रसिद्ध कार्य, जो सीधे देखने को नहीं मिले थे, जिन्हें हम पत्र-पत्रिकाओं में या इंटरनेट पर देखते आ रहे थे, उन्हें इतने क़रीब से देखना एक दिलचस्प अनुभव था। लेकिन एक कलाकार ने थोड़ा अन्दरतक हिला दिया।

—ऐसौ कौन कलाकार मिल गयौ रे?

—वेन गिलबर्ट नाम था। अमरीका में ह्यूस्टन का रहने वाला। सादा सी वर्गाकार तीन घड़ियां थीं। तीनों का एक ही शीर्षक था, ’समव्हेयर इनबिटवीन’। दो फुट बाई दो फुट के चौखटों पर बनी दो थीं, बीच वाली एक फुट बाई एक फुट की थी। तीनों एक के नीचे एक लटक रही थीं। लगा जैसे बुरादेसे बनी हों या कैनवास पर गोबर लीप दिया गया हो। संख्याएं और सुइयां काले रंग के बुरादे से बना दी गई थीं। एक घड़ी में बारह बजने में डेढ़ मिनट, दूसरी घड़ी में ठीक बारह और तीसरी घड़ी में बारह बजकर डेढ़ मिनट। असाधारण रूप से साधारण थीं। शायद यही उनका आकर्षण था। मैं देरतक देखता रहा। क्या चाहता है कलाकार? समय का बोध कराना चाहता है क्या? बारह बजे कुछ घटित हुआ जिसका अनुमान हमें डेढ़ मिनट पहले नहीं था, डेढ़ मिनट बाद क्या हुआ, यह दार्शनिक-सा संकेत, वे घड़ियां देना चाहती रही होंगी। शिल्प की दृष्टि से कुछ भी तो खास नहीं था।अचानक कलाकार वेन गिलबर्ट ने मेरे कंधे पर हाथ रखा और उसने जो बात बताई, मैं अन्दर तक हिल गया।

—हां, वो बात बता ना!

—उसने बताया कि मैटीरियल के रूप में मानव के अवशेष हैं। राख है इंसान की, जो उसकी अंत्येष्टि के बाद प्राप्त हुई। हर घड़ी के पीछे उन लोगों के नाम भी लिखे हुए थे, जिनके अवशेषों का बुरादा था।

—कमाल की बात ऐ!

—वैसे मनुष्यों के अवशेष को कला-रूप में सज्जित करना कोई नई बात नहीं है। मिस्र की ममीज़ को बहुत सजा-संवरा कर आज तक सुरक्षित रखा हुआ है। बहरहाल, चल-चल कर काफी थक गया था, सो गिलबर्ट के साथ बैठ गया। ज़रा और बतियाने का मौक़ा मिला। उसने बताया कि वह तो एकमोर्टार-तोप और ईंट-पत्थर किस्म का आदमी था, जिसके अन्दर कला की कोई संवेदना-तमन्ना नहीं थी। अचानक मानव दरिन्दगी और ज़िन्दगी के अन्धे दर्शन ने उसके अन्दर कलातत्व जागृत किए। पैंतीस वर्ष की उम्र में उसने कला विद्यालय में प्रवेश लिया और कलाओं के इतिहास को जाना। उस इतिहास में मनुष्य के अवचेतन को जानने की कोशिश की। मनुष्यता के इतिहास के आस-पास पहुंचने के लिए कलाओं में छिपे अवचेतन को जानना महत्वपूर्ण है। बात बड़े पते की कही थी चचा। मैं उसकी बात से लगभग सहमत था, क्योंकि निर्वसन महिलाओं-पुरुषों और यौन इच्छाओं केकुत्सित-से सौन्दर्यशास्त्र को हम चित्रों में तो देख सकते हैं, लेकिन अगर कोई शब्दों में उस चित्र का वर्णन करने को कहे तो उलझन में पड़ जाएंगे। खैर छोड़िए, आंखों के ज़रिए जो दोआयामी या अनेकायामी चीज़, किसी भी तरह झकझोरे, वही आधुनिक कला है। लेकिन, मानवीय राख को रंगकर चित्र बनाना, कलाकार को किस रचना-प्रक्रिया से गुज़ारता होगा, मेरे लिए तो यही अजूबा है। कला में जो हो जाए सो थोड़ा!

 


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