अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > कल आज और कल का विवेक

कल आज और कल का विवेक

कल आज और कल का विवेक

 

—चौं रे चम्पू! भिरस्ट कौन ऐ रे?

—सब भ्रष्ट हैं।

—तू भिरस्ट ऐ?

—मैं मनुष्य हूं चचा। कोई देवता नहीं हूं। वेद-पुराण और हर धर्म का इतिहास देख लो, कभी न कभी, कहीं न कहीं दैवीय व्यक्तित्वों से भी चूक हुई है। ये बात दूसरी है कि उनकी गलतियों का बखान लीलाओं की तरह किया गया। उनके लिए मनुष्य की आस्था ने ‘कूल’ और अनुकूल तर्क गढ लिए। छूट दे दी, क्योंकि वे ग़लतियां ऐसी थीं जिन्हें प्राय: हर मनुष्य करता था। प्रतिशोध, हिंसा, झूठ, कपट, लालच, अपघात, ऐन्द्रिक विकार, लांछन, छल और युद्ध-गाथाओं से किताबें भरी पड़ी हैं।

—युद्ध नायं रे धरमयुद्ध! बुराई ते लरिबौ जरूरी है जायौ करै। सबन्नैं बुरौ बताय कै तू सरलीकरन मत कर।

—मैंने कब कहा कि लड़ना या विरोध करना बुरा है। वही तो मनुष्यता और प्रगति की पहचान है। आपने पूछा भ्रष्ट कौन है? समय के साथ भ्रष्टत्व का तत्व अपने रूपाकार बदलता रहा है। पहले भ्रष्ट अशुद्ध को कहा जाता था। भोजन भ्रष्ट होता था। उच्छिष्ट को भ्रष्ट माना जाता था, जूठन भ्रष्ट होती थी। धर्मच्युत कार्य करना भ्रष्ट आचरण होता था। जो करता था पापी कहलाता था। भ्रष्ट विकृत को भी कहते थे।

—जादा भासा-सास्त्री मत बन, इन दोऊन में भौत फरक ऐ।

—चचा! समय के साथ शब्दों के अर्थ बदलते जाते हैं। पहले कोई काम या यंत्र या वाहन बिगड़ता था, अटकता, रुकता या ठप होता था तो उसे भ्रष्ट या विकृत कहा जाता था। चरित्र का खोटापन भी भ्रष्टत्व माना जाता रहा है। कायदे-कानून गढ़ने वाले पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री को ही भ्रष्ट व्यभिचारिणी के विशेषण मिले हैं, दामन पर दाग चुनरी में ही लगते आए हैं, पुरुष के अंगवस्त्र पर नहीं। चरित्र के मामले में उसके दुराचरण को मुस्कानों में टाल दिया जाता रहा है।

—तू आज की बात कर, भिरस्ट कौन ऐ और भिरस्टाचारी कौन ऐ?

—भ्रष्ट का उल्लेख तो अनेक रूपों में होता आया है लेकिन भ्रष्टाचार शब्द का चलन ज़्यादा पुराना नहीं है। हां व्यभिचार शब्द प्राचीन काल से चलन में रहा है। पल-पल बदलने वाले तेतीस संचारी भावों को व्यभिचारी भाव भी कहा जाता था।

—फिर भटक गयौ! आज के भिरस्टाचारी की बात कर।

—आज तो सब जानते हैं कि भ्रष्टाचारी का मतलब है घोटालेबाज़, बेईमान, श्यामधन जोड़ू, आर्थिक घपलेबाज़। अब चरित्र के पतन को भ्रष्टाचार की परिधि से निकाल दिया गया है। काले धन से और काले धन के लिए गड़बड़झाला करने वाला भ्रष्टाचारी है। दो लोग बात कर रहे थे चचा। एक बोला मेरे पास काफी काला धन है और तेरे पास? दूसरे ने जवाब दिया काला धन होगा तेरे पास मेरे पास तो सब सफेद है, अपना थोड़ा सा काला धन मुझे दे दे, तेरा भी सफेद करा दूंगा। भ्रष्टाचार देश की नस-नाड़ी में व्याप्त हो चुका है। उसी भ्रष्टाचार से सीधी लड़ाई मीडिया द्वारा दिखाई जा रही है। प्रधानमंत्री मानते हैं कि भ्रष्टाचार है लेकिन उसे मिटाने के लिए कोई जादू की छड़ी उनके पास नहीं है। उन्होंने कहा कि अनशन से भी भ्रष्टाचार नहीं मिट जाएगा। चचा, भ्रष्टाचार एक ऐसी बुराई बन चुका है जो अपने आचरण में नहीं दूसरों के आचरण में ही दिखाई देता है। सवाल तो उस भविष्य-दृष्टि का है जो देश को स्थिर रखे। भ्रष्टाचार रुके या न रुके परिवर्तनकामी आंधी को रोकना मुश्किल होता है। जादू की छड़ी कहीं और नहीं है, अपने अंदर ही पड़ी है। परिवर्तन के लिए उन आंतरिक छड़ियों का आन्दोलन हो तो कुछ बात बने। विधि, विधान, संविधान क्या नहीं है अपने पास!

—बाहर की बात कर लल्ला। जो अंदर कर दिए, उनकी बात कर। सबते ऊपर की सीढ़ी पै पानी डारौगे तबहिं नीचे वारी साफ होयगी।

—सवाल ये भी है कि ऊपर की सीढ़ी पर पानी डालने वाले कौन हैं। उनके ख़ुद के चरण और आचरण कितने साफ़ हैं। उनके पास पानी कितना शुद्ध है। इसलिए संभल-संभल पग रखना होगा। कल जो हुआ उसे आगे आने वाले कल से जोड़कर देखना होगा। परिवर्तन हो, विवेक संयम और शांति के साथ।

 


 


Comments

comments

Leave a Reply