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  • कहां जाऊंगा? तेरा ही पुरुष हूं!
  • कहां जाऊंगा? तेरा ही पुरुष हूं!

    kahaan jaaungaa teraa hee purush hoon

     

     

     

     

     

     

     

     

    कहां जाऊंगा? तेरा ही पुरुष हूं!

    (अब बारी आई पुरुष के बोलने की, इसकी भी सुन लें)

     

     

    बड़े ही धैर्य से मैंने सुना है,

    सुना जितना अधिक उससे गुना है।

     

    किए अन्याय तुझ पर मानता हूं,

    हुए अन्याय तुझ पर मानता हूं,

    कभी ललना कभी छलना बताकर

    लिखे अध्याय तुझ पर मानता हूं।

     

    तुझे छल से कभी बल से दबाया,

    कभी परिणाम से, फल से दबाया,

    दबाया रौद्र में वीभत्स दिख कर

    विफलता में नयन-जल से दबाया।

     

    दबाया सौ तरह के डर दिखा कर,

    दबाया रत्न-सज्जित घर दिखा कर,

    नहीं मानी अगर मनुहार से तो

    दबाया मारने को कर दिखा कर।

     

    मैं जैसा भी हूं सदियों में बना हूं,

    तू जड़ गहरी, तभी तो मैं तना हूं,

    मुकाबिल आंधियों से रहा फिर भी

    तना मज़बूत हूं, साया घना हूं।

     

    मगर जब तू स्वयं विस्फोट देती,

    मुझे अपने अहं से चोट देती,

    दिखा कर स्वावलंबन की चुनौती

    हृदय के भाव सारे घोट देती….

     

    समाजों ने कहा मुझसे कि सह मत!

    रिवाजों ने कहा मुझसे कि सह मत!

    रवायत ने कहा मुझसे कि सह मत!

    हिदायत ने कहा मुझसे कि सह मत!

    यही इतिहास ने मुझको सिखाया

    पुराणों ने कहा मुझसे कि सह मत!

    तेरी हर बात से फिर भी हूं सहमत।

    मैं सहमत हूं, मैं सहमत हूं

    नहीं मैं निष्कलुष हूं,

    कहां जाऊंगा? तेरा ही पुरुष हूं!

     

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