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क़ानून से ऊपर आरुषि

क़ानून से ऊपर आरुषि

 

—चौं रे चम्पू! कानून ते ऊपर कौन ऐ रे?

—क़ानून से ऊपर सूर्य की पहली किरण है, यानी ‘आरुषि’। अंधकार चीरते हुए प्रकट हो जाती है क़ानून की किरण। अंधकार साढ़े पांच साल लंबा हो सकता है पर आरुषिउजाले की चाहत में बादलों को भेदते हुए, अंधेरे को चीरते हुए निकलने को छटपटाती है।

—अंधकार इत्तौ लंबौ चौं है जाय?

—कारण यह है कि क़ानून ताबूत और तबाही की नहीं, सबूत और गवाही की मानता है। तबाही चीख-चीख कर कहती है कि मैं हूं, मैं हूं, पर क़ानून ही उसे चुप कर देताहै, हट, तेरी सुनता कौन है! ताबूत कुछ बोल नहीं सकता, तबाही धीरे-धीरे गूंगी होने लगती है। क़ानून के कान भी ज़रूरत से ज़्यादा धैर्य दिखाते हैं। ठहर-ठहर कर सुनतेहै। दोनों पक्ष चीखें, तो टल जाती हैं तारीखें। सिद्ध करो कि घर में चार लोग थे, न कि सात। किसने किया था घात? क्या था वारदातों का सिलसिला? जो नौकर भागचुका था, उसका शव तुम्हारी छत पर कैसे मिला? सर्जिकल ब्लेड से सफ़ाई से गला काटा गया। तुम कहते हो कि डीएनए टेस्ट झूठा है क्योंकि लिफ़ाफ़ा काटा गया।दोनों का ख़ून हुआ, क्या ये तथ्य निगेटिव था? जी, दोनों का हुआ ख़ून एबी से लेकर वाईज़ैड तक पॉज़िटिव था। शराब की बोतल पर मृतका के रक्त की निशानी थी।क्या उसे क़त्ल के बाद शराब पिलानी थी? अपराध के शव पर अंधेरे का क़फ़न कब तक चढ़ा रहता चचा?

—लल्ला अंधेरे की उमर बड़ी लम्बी होयौ करै आजकल्ल।

—हां, अपराधों के लिए अंधेरा बड़े काम की चीज़ है। दंडविहीनता की स्थिति अपराध को दुस्साहस में बदल देती है। शायर बशीर बदर ने कहा था, ’रात का इंतज़ार कौनकरे, आजकल दिन में क्या नहीं होता’। अंधकार को बढ़ाने में एक अदृश्य शक्ति और है, जिसका नाम है काला चोर। अजी मैंने नहीं किया, काले चोर ने किया होगा।क़ानून उस अदृश्य काले चोर को पकड़ने में अपने लाल फ़ीते की ताक़त लगाता है। अंधेरे की दूसरी समर्थक शक्तियां भी क़ानून की हवा निकालती रहती हैं।

—कानूनन पै भरोसा है तोय?

—क्यों नहीं! मैंने तो लिखा था, ‘जैसे कि इस देह में ख़ून है, वैसे ही जीवन में क़ानून है। छोटा बड़ा कोई, अनपढ़-पढ़ा कोई, सबको है एक समान ये। निर्धन-धनी कोई,बन्ना-बनी कोई, सब पर तनी है कमान ये। ये हो तो रहता है चैनो-अमन, इसकी वजह से ही सुक्कून है। जैसे कि इस देह में ख़ून है, वैसे ही जीवन में क़ानून है। सबकीसुरक्षा का, जीवन की रक्षा का, देता हुकूकों का ज्ञान ये। हर गांव रहता है, हर ठांव रहता है, रहता है दुनिया जहान ये। हमको बचाता है ये इस तरह, सर्दी में जैसेगरम ऊन है।

—राजेस-नूपुर कूं तौ सर्दी में पसीना आय गए, बीपी बढ़ि गयौ, कैसै बचिंगे?

—अगर आप मानते हैं कि वे निरपराध हैं, तो बच भी सकते है। सज़ा के बाद अभी तो अपील का समय है। ऊपर की अदालतें हैं। कुछ नए सबूत मिलें, नए तर्क मिलें,संदेह का लाभ मिले, तो बच सकते हैं। काश कि वे निरपराधी हों। देश के बच्चों का भरोसा तो नहीं टूटेगा कि माता-पिता कभी हत्यारे नहीं हो सकते। लेकिन अगर वेबेटी की प्राकृतिक किशोर कामनाओं-जिज्ञासाओं पर रीसे हों, क्रोध और आवेग की आंधी ने दानवी दांत पीसे हों, तो अब ये अगले फैसलों तक चक्की पीसें। क़ानून‘आरुषि’ है, भोर की किरण। क़ानून ‘तरुण’ भी है, क्योंकि संविधान के ज़रिए स्वयं को नवीनीकृत करता रहता है। क़ानून अपने नए ‘तेज’ से नियमों को ‘पाल’ रहा है।देखा नहीं तरुण तेजपाल भी निस्तेज हो रहे हैं, बलात्कार की नई व्याख्याओं के बाद!

—तेरी कबता खतम है गई?

—आगे सुनो, ‘जीने का रस्ता है, नियमों का बस्ता है, हर मुल्क का मानो प्रान है। कैसे चलाते हैं, कैसे बनाते हैं, इसके लिए संविधान है। ये संविधान होता है क्या?क़ानूनों का भी ये क़ानून है।’ संविधान सबको न्याय की गारंटी देता है।

—न्याय-फ्याय, सब कहिबे की बात ऐं रे! सबकूं न्याय मिलै कहां ऐ?

—आप भी ठीक कह रहे हैं। दिक्कत हमें, आती है तब, हो जाता क़ानून का ख़ून है।

 


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