अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > कानून में भावना आ जाए

कानून में भावना आ जाए

कानून में भावना आ जाए

kaanoon mein bhaavanaa aa jaae

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

—चौं रे चम्पू! कानून और भावना में का सम्बन्ध ऐ? कछू बताएगौ?

—अरे चचा, बड़ा भारी सवाल पूछ लिया। इस पर तो अनंत बहस हो सकती है, लेकिन पूछा किस सिलसिले में है?

—अरे सिलसिला की का चलाई। फांसी की माफी कित्ती उचित ऐ, कित्ती अनुचित, जेई सोचि रह्यौ ओ मैं। तू बता कानून और भावना की बात।

—चचा, जहां तक फांसी का सवाल है, पूरे विश्व में एक राय बन रही है कि मृत्यु-दंड नहीं होना चाहिए। हम जीवन दे नहीं सकते, तो ले कैसे सकते हैं? जब हम तकनीक-निर्मित एक नया मनुष्य उत्पन्न करने की क्षमता नहीं उत्पन्न कर पाए कि जिसको फांसी दी जाए उसका वैकल्पिक शरीर, येलीजिए, समाज को ये नुकसान नहीं पहुंचाएगा। और फिर जब व्यक्ति मर ही गया तो उसे दंड कहां मिला? कई तरह के तर्क हैं दोनों पक्षों के, लेकिन कोई व्यक्ति समाज के लिए नुकसानदेह है, इसे क़ानून तय करता है और आप जानते हैं कि कानून बनने के बाद धीरे धीरे अपने आपको इतना रूढ़कर चुके होते हैं कि जिन भावनाओं के मद्देनजर उनका निर्माण हुआ होगा, वे भावनाएं पीछे छूट जाती हैं। भावना से कानून का कोई ताल्लुक रह नहीं जाता है। माफी भी एक भावना के तहत ही होती है, लेकिन हमारे यहां यह माफी व्यक्ति को धार्मिक दबाव अथवा राजनीतिक

परिस्थिति केअनुसार दी जाए, ऐसा नहीं होना चाहिए।

—पहलै का आदमी नै आदमी कूं मारौ नाऐं?

—हां क्यों नहीं! पहले युद्ध होते थे। जब कोई किसी की भावनाओं को आहत करता था, तलवारें निकल आती थीं। आमने-सामने और आर-पार की लड़ाई होती थी। इस हत्याकाण्ड को युद्ध कहा जाता था चचा। मरने वाले के लिए कहा जाता था, और आज भी कहा जाता है कि वीरगति को प्राप्तहुआ। क्षत्रिय मर-कटते थे। ज़रा-ज़रा सी बात पर मूंछों का सवाल हो जाता था। कभी किसी रानी के अपहरण को लेकर, कभी राष्ट्र की सीमा-रेखाओं को लेकर, पशु धन, गौधन, गजधन, बाजधन को लेकर, रत्नधन की खान को लेकर। चील-गिद्धों के संतोष धन के साथ भोज होते थे। हालांकि, उससमय की सामरिक सीमाओं को देखते हुए यह नियम भी बनाया गया कि सूर्यास्त के बाद युद्ध नहीं होगा, वह भी तो एक कानून था। कोई नहीं चाहता कि युद्ध हो। दोनों पक्ष नहीं चाहते रहे होंगे कि युद्ध हो। अगर रात में हमला कर दिया जाए तो दोनों तरफ के मरेंगे। भावनाओं के अतिशय उद्रेकके बावजूद इस नियम का पालन होता था, नियम तोड़े भी गए हैं। कौरवों ने तोड़ा, रात में पांडवों का शिविर जला दिया।

—अब कोई राजतंत्र तौ है नायं, जनतंत्र ऐ!

—वही तो! जनतंत्र में पूरी जनता की भलाई देखी जाएगी। जिस व्यक्ति को फांसी की सजा सुनाई गई वह तो सींखचों के भीतर न जाने कितनी बार मर चुका है। हर पल, हर दिन उसे फंदा नज़र आता रहा होगा। उम्र कैद में बदल दो तो कम से कम जीने की आस तो रहेगी, बदलने की गुंजाइश केसाथ!।

—सुनी ऐ कै अमरीका नै मृत्यु-दंड खतम कर दियौ ऐ!

—किया था, पर पुनर्विचार भी हो रहा है। ये बताइए कि लादेन को क्यों मारा? वह भी तो मृत्युदण्ड था। मानवाधिकार आपके अपने देश के मानवों के लिए ही हैं, पूरी दुनिया के मानवों के लिए नहीं हैं? तर्क दिया गया कि यह आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध है, ठीक है! ध्यान रहे कि फ़र्जी एन्काउंटर नहों। हां, फांसी पर बहस की जा सकती है क्योंकि मामला अधिकतर तात्कालिक भावना-सापेक्ष होता है। हर किसी के पास अपनी भावनाओं की शुद्धता का अपना तर्कशास्त्र होता है। सामने वाला अपनी भावनाओं के लिए अलग तर्कशास्त्र रखता है। भावनाएं नहीं टकरातीं, तर्क टकराते हैं और जबसचमुच सकारात्मक भावनाएं सामने आ जाती हैं तो तर्क तिरोहित हो जाते हैं। माना कि भावना कानून से बड़ी नहीं होती पर क़ानून को भी भावनाप्रवण होना चाहिए। आतंकवादियों के विरुद्ध तो युद्ध ही उचित है। दंगों में भावनाएं भड़कती हैं, आगज़नी होती है, बेगुनाह मरते हैं, आतंकवाद केविरुद्ध पुख़्ता क़ानून अभी तक बने ही नहीं हैं। समाज में उन लोगों की भावनाएं भी सामने आती हैं जो पीड़ित परिवारों को बचाते हैं। उन्हें किसी कानून ने कोई पुरस्कार दिया क्या? कानून बस दण्ड देना ही जानता है। जिस दिन कानून में भावना आ जाएगी, उस दिन वह पुरस्कार भी देनेलगेगा।

 


Comments

comments

Leave a Reply