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जो लोगों के दिलों को छुएं

जो लोगों के दिलों को छुएं

 

—चौं रे चम्पू! मैंनैं खबर पढ़ी कै आगरा में तेरी फिलम ‘बिटिया’ दिखाई गई! मोय चौं नायं बताई?

—हां, दिखाई गई थी जेएफएफ महोत्सव के दौरान। मैंने भी पहली बार इतने बड़े पर्दे पर ’बिटिया’ देखी, वहां की एक मॉल के मल्टीप्लैक्स में। बढ़िया साउंड सिस्टम, बढ़िया प्रोजैक्शन। मुझे आनन्द तब आता था जब हॉल में दर्शकों को आनन्द आ रहा होता था।

—कब बनाई, कैसै बनी, बता!

—चचा, अब से पच्चीस साल पहले दूरदर्शन के लिए ‘भोर-तरंग’ धारावाहिक बनाया था। देशभर के छोटे-बड़े शहरों में जाता था और सूर्योदय के समय की सांगीतिक गतिविधियों को रिकॉर्ड करता था। लोकेशन पर ही काव्यात्मक भूमिका भी बना देता था। होडल के पास बंचारी नाम के एक गांव में गया तो वहां दिलचस्प चीजें सामने आईं। बंचारी में ग्यारह संगीत की मंडलियां थीं। सबके पास अपने-अपने लोक-वाद्य थे, बड़े-बड़े दमामे, नगाड़े, ढोलक, झांझ-मंजीरे, थाली-डंडी और कुछ और स्थानीय वाद्य। वाद्य-वृंद के आमने-सामने के मुक़ाबले के अलावा चौपाल पर गायकी का मुक़ाबला भी हुआ करता था, रसिया, लावनी, भगत, स्वांग और नौटंकी की तरह-तरह की बहरें। ख़ूब सारे वादक, ख़ूब सारे गायक, कवि भी कम नहीं। तत्काल किसी लोकधुन पर गीत बनाते थे, गाते थे और सामने वाली मंडली के आगे चुनौती फेंक देते थे कि अब तू जवाब लिख इसका। शूटिंग के दौरान दो मंडलियों में किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ। वहां के एक चौधरी ने बीच-बचाव कराते हुए कहा कि देखो इस चौपाल की रवायत है कि यहां कोई भी बात गद्य में नहीं कही जाएगी। लड़ना भी है तो गाकर लड़ो।

—ऐसौ होय तौ आधी लड़ाई तौ अपने आप खतम है जायं।

—हां चचा। यही विचार मेरे ज़ेहन में था। पांच साल बाद इसी अवधारणा से प्रेरणा लेकर मैंने एक सामाजिक संदेश, कि कम उम्र में बच्चों की शादी नहीं करनी चाहिए, रेडियो के लिए एक सांगीतिक नाटक लिखा ‘अंगूरी’। जिसे आगे आने वाले पांच साल तक सौंग एण्ड ड्रामा डिवीजन के कलाकार मंचित करते रहे। मंडलियों का लड़ाई-झगड़ा गीतों में ही था। गांवों में ये नाटक सुपर हिट जाता है। उसके सौवें प्रदर्शन पर स्वास्थ्य मंत्रालय के सचिव महोदय मौजूद थे। वे मुझसे कहने लगे कि इस पर फिल्म बननी चाहिए, आप बनाइए! मुझे क्या एतराज़ होता, लेकिन इस प्रस्ताव को रूपाकार लेते-लेते फिर पांच साल बीत गए। मंत्रालय और एनएफडीसी के सहयोग से ‘बिटिया’ फिल्म बनी दो हज़ार एक में। फिल्म बड़े पर्दे के लिए नहीं, छोटे पर्दे के लिए बनानी थी, बजट भी छोटा था। अन्नू कपूर, रघुवीर यादव का गायन अद्भुत था। अन्नू, पवन दीक्षित और वेगा टमोटिया ने काम अच्छा किया, लेकिन सरकारी गति तो आप जानते ही हैं, फिल्म का दूरदर्शन पर प्रदर्शन निर्माण के पांच साल बाद हुआ। छोटे परदे पर दिखाने के पांच साल बाद मल्टीप्लैक्स के बड़े परदे पर पांच दिन पहले आगरा में दिखाई गई ‘बिटिया’। आनन्द आ गया चचा! विषय आज भी जीवंत है। कल शाम एक फोन आया उससे तो मैं परमानन्द को प्राप्त हुआ।

—कौनकौ फोन?

—दमदार सी आवाज़ थी— ‘जी मैं आपके चरण छूता हूं।’ अब फोन पर पता नहीं लोग चरण कैसे छूने लगते हैं, बोले ‘अभिभूत हुआ बिटिया देखके। ख़ूब हंसा, ख़ूब रोया।’ और जी वे तो फिल्म का स्मरण करके फोन पर ही रोने लगे। मैंने कहा— ‘भैया शांत हो जाओ, अगली फिल्में ऐसी बनाऊंगा, जिसमें हंसाऊंगा ज़्यादा, रुलाऊंगा कम।’ फिर वे कहने लगे— ’नहीं नहीं, भावनाएं जगा कर रुला देना तो आपकी ताक़त है। मैं एक वैद्य हूं, मेरी उम्र बयासी साल है। किसी सामाजिक समस्या पर मैंने इतनी प्रभावी फिल्म अपने जीवन में नहीं देखी।’ चचा! इससे बड़ा पुरस्कार मेरे लिए और क्या हो सकता था। मैंने कहा, आप अपना चरण-स्पर्श वापस ले लीजिए, मैं फोन पर आपके चरण छूता हूं, लेकिन मेरी कामना है कि अगले पच्चीस साल तक युवाओं के सहयोग से कुछ फिल्में और बनाऊं जो लोगों के दिलों को छुएं।

 


 


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