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    जिया हे प्रहार के लाला

    —चौं रे चम्पू! कैसे मिजाज ऐं रे?

    —मेरे मिजाज़ क्या होंगे चचा! मिजाज़ बदल रहा है ज़माने का, संस्कृति का, फ़िल्मों का।

    —कौन सी फिल्लम देख आयौ?

    —ओसियान फ़िल्म फ़ेस्टीवल में गैंग ऑफ़ वासेपुर पार्ट टू देखी। पार्ट वन पहले देख चुका था। सीरीफोर्ट सभागार खचाखच भरा था। इन दर्शकों के साथ फ़िल्म देखना एक अलग अनुभव था।

    —चौं, का भयौ?

    —हाथरस मथुरा के दर्शक याद आ गए, पैंतीस-चालीस साल पुराने। हो-हल्ला सीटी। बस दुअन्नी चवन्नी नहीं फिंक रही थीं। फेंकते भी कहां से, सब एटीएम क्रेडिट कार्ड वाले थे। मैं जब पहुंचा तब पार्ट वन समाप्त होने वाला था। गाना चलरहा था, ‘जिया हो बिहार के लाला’। तालियां ही तालियां। फ़िल्म ख़त्म हुई। मंच पर आई डायरेक्टर अनुराग कश्यप की टीम। मैंने सोचा कि ये लोग अगली फ़िल्म के बारे में कुछ बताएंगे पर अनुराग ने कहा कि बाहर जाने वाले लोगों से मैंकहना चाहता हूं कि वे अपनी ही सीट पर लौटें। बस इतना कहा और माइक अपने सहयोगी को थमा दिया। उसने कहा, देखिए बाहर बहुत भीड़ है, शायद आपकी सीट सुरक्षित न रहे। अगर किसी को जाना बहुत ही ज़रूरी लग रहा हो…, अनुरागकश्यप ने माइक छीन लिया, तो उसका उपाय ये है कि आपके पास पानी की जो ख़ाली बोतलें हैं, उनका इस्तेमाल करें। एक सामूहिक ठहाका लगा और तालियां बजीं। अब सिनेमा और जन-संवाद में कोई आडम्बर नहीं। पहले मंच पर आने सेपहले आदमी दस बार सोचता था कि उसे क्या बोलना है, लेकिन अब मंच पर वह भी बोला जा सकता है जो आपके दिमाग़ में तत्काल आए। बोल दिया सो बोल दिया।

    —फिर का भयौ?

    —पार्ट वन जिस दृश्य से समाप्त होता है, उसी से पार्ट टू शुरू होता है। फिर वही गाना ‘जिया हे बिहार के लाला….।’

    —गाने में का खास बात ई रे?

    —ख़ास बात, ज़माने के बदलाव की। संगीत और शब्दों के बदलाव की ऐसी धमक जो आज के श्रोता-दर्शक को पसन्द आ रही है। नायक मर रहा है। गाना उल्लास का है। है न चौंकाने वाली बात। गोली उसके भेजे में लगी है। चार-पांच मिनिटका स्लो-मोशन। अपनी हत्या किए जाने के प्रयत्नों के बाद जीवन-संघर्ष करते हुए, अपनी अंतिम ख्वाहिश के साथ वह चलता चला जा रहा है। प्रतीक्षा करवा रहा है दर्शकों से कि वह कब गिरेगा और कब मरेगा। इतनी गोलियां लग चुकीहैं कि मरना तो निश्चित है। हत्या की स्तब्धता तोड़ता है गाने का प्रिल्यूड। धीरे धीरे ड्रम्स बजते हैं, नगाड़े पर टर्र होती है, भोपा की पीपनी बजती है, कुछ जुगनी की सी धुन और बिहार की लोक धुनों पर ढोल। ताल वाद्यों के साथशानदार ठेका लगता है। एक थाप के बाद उभरता है स्वर, ओ…. एक आलाप, एक गूंज! जिस गूंज में एक लोक-पुकार है। जिया हो बिहार के लाला, जिया तू हजार साला। तालियां! किस बात पर? किसी ग्लैडिएटर के मृत्यु-पूर्व बहते रक्त केफव्वारों पर। रोमन नागरिकों की तालियां! तालियां, प्रतिहिंसा के संकल्प पर कि अगले भाग में तेरी (जान) कह के लेंगे, रामाधीर सिंह! जिया तू तनी नाचि के, तनी गाई के, और सबका मन बहलावा रे भैया। मौत दर्शकों का मन बहला रही थीचचा। मौत स्लो मोशन में नाच रही थी। मौत गा रही थी। अगर मौत का होना रुकता नहीं है, हिंसा थमती नहीं है, और आप कुछ कर नहीं सकते हैं, तो उल्लास में गाने के अलावा विकल्प क्या है? ढोल, पीपनी, ड्रम्स, चन्दन, माटी, गंगा,काठी, लावा रे भैया। उमंग में छिपा हुआ है दर्द। दर्द को तोड़ता है दूसरा उमंगित दर्द। दर्द और मर्द के बीच जी रही है वुमनिया। उसके काम अलग हैं, बिहार का लाला कहता है आप प्याज काटिए। बिहार के लाला के पास कट्टा है। कट्टाइंसान को प्याज समझता है। प्याज़ बारीक काटी जाती है, कई बार चाकू मारना पड़ता है प्याज़ में। कौन कब किसका शत्रु हो जाए समझना मुश्किल है। काम बारीक है अनुराग कश्यप का। वे प्रहार के लाला हैं। आज का सामाजिक यथार्थख़ून के फव्वारों के साथ मज़ा देकर एक स्पेस बना रहा है, जहां वे आपसे किसी विचार की प्रतीक्षा करवाते हैं। अभी मज़ा ले लो पर बाद में सोचना भी। जिया हे प्रहार के लाला!

     

     

    wonderful comments!

    1. Naveen Pradhan अगस्त 15, 2012 at 11:53 अपराह्न

      Hey Ashok Ji Aap Ki Tippni Behad Thiik Hai...Team Anu Ragiiy Kash Yaap Ke Kamal Ki Tareef Karengen Magar.....Vase Ye Vasepur Kis Samaj Ko Dikha Raha Hai?....Kyaa Sandesh Hai?.....Thake Maare...Middle Class...Aam Aadami Ko....Ek....Relexiy Film Chaahii Na Ki Kooootam Kooot....Goliyon Ki Awaaz....Yaad Hai Aap Ko Hamane Aap Ne Netratv Main Aligarh Ki Numaayiish Ke Doran Ek Film Dekhi Thii "Raj Kumar" Shammi Ji Ki....Baat 1967-68 Ki Hai....Jyaa Aisii Film Nahiin Dekhengen Ham Sab...Or Fir.....Relexiyaa Andaaz Main.."Ham Hai Yahaan Ke Raj Kumar.....Hoshiyaar!!.....[email protected]

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