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    जितनी सारी हैं सब फ़िकर छोड़ो      

    —अशोक चक्रधर

    —चौं रे चम्पू! आज हमारौ मन चौं नायं लगि रह्यौ, तू कारन बताय सकै?

    —कारण आपको स्वयं पता होंगे, मैं कैसे बता सकता हूं?

    —जेई तौ दिक्कत ऐ, कारन हमैंऊं नायं पतौ।

    —जब स्वयं को ही पता न चले तब सिर्फ़ एक कारण नहीं होता, कारणों की उलझी हुई अनेक डोरियां होती हैं। उन्हें सुलझा लो तो मन ठीक हो सकता है।

    —तौ सुलझा फिर!

    —कोई ओर-छोर तो बताइए। अगर ये उलझन है कि किस प्रत्याशी को वोट दें, तो पहले इसी को सुलझाते हैं। देखिए, अगर आप परिवर्तन के लिए परिवर्तन चाहते होंतो दूसरों को दीजिए, वरना उसे दीजिए जिसने काम करके दिखाया है।

    —सो मत बता, हम तै करि चुके ऐं। एक उलझन जे ऐ कै सब के सब बोट डारिबे चौं नायं जायौ करैं? बोट की ज़िम्मेदारी चौं नायं समझैं?

    —तो चलिए, बगीची पर एक प्रोग्राम रख लेते हैं। आवाहन की एक कव्वाली अभी लिख देता हूं। आप तो बस एक मेहरबानी करिए कि अपने मन को उचटने से बचाइए।

    —लिख, लिख। काग़ज़ हतै लिखबे कूं?

    —आजकल मोबाइल पर भी लिख लेता हूं चचा।

    —तेरी कब्बाली बगीची के सब लोग मिलिकै गामिंगे, तारी बजामिंगे। तू लिख, मैं अभाल आयौ…

    —आइए चचा! आप तो काफ़ी नौजवान बटोर लाए। जितना लिखा है, सुन लीजिए, ख़ुद पे और हम पे सितम ढाते हो! डालने वोट क्यों न जाते हो? डालना वोट अगर चूकगए, तो समझ लो सभी हुकूक गए। वोट ताज़ा हवा का झोंका है, डालना वोट एक मौक़ा है। वोट से देश ये फुलवारी है, डालना वोट ज़िम्मेदारी है।’ गाने में मेरा साथदीजिए न, तालियां बजाते हुए। डालना वोट ज़िम्मेदारी है!

    —डालना वोट ज़िम्मेदारी है!!

    —आगे कहता हूं, ’डालने वोट गर न जाएंगे, बाद में बैठ के पछताएंगे। वो न आया जिसे चाहा हमने, जिसको अन्दर से सराहा हमने। वो जो इन सबमें सबसे क़ाबिल था,ख़ामख़ां जीता, जो मुकाबिल था। गर चले जाते तो मन का होता, हमने आलस्य में मारा गोता। बाद में ये नहीं मलाल रहे, मन के आगे खड़ा सवाल रहे। रह गया कोईअच्छा आने से, फर्क पड़ता हमारे जाने से। ज़मीर को खुरेंच मत देना, वोट तुम अपना बेच मत देना। वोट के बल से देश चलता है, वोट से लोकतंत्र फलता है। देश कोक्यों न जगमगाते हो? डालने वोट क्यों न जाते हो? दोहराइए!

    —डालने वोट क्यों न जाते हो?

    —बहुत अच्छे! आपने तो रौनक लगा दी। अब यहां सिर्फ़ गाने-बजाने के लिए नहीं बैठना है। चचा, कहिए अपने सारे पट्ठों से कि सबके सब वोट डालने जाएं और दूसरोंको भी प्रेरित करें।

    —जाऔ रे जाऔ, सोच समझि कै बोट डारौ। झूटे और भिरष्ट लोगन कूं मत दइयौं, जो बिकास करै, कछू करिकै दिखाबै, ताहि दइयौं! जाऔ, मोय चम्पू ते और बातकन्नी ऐं। …हां रे चम्पू! मन न लगिबे के कछू और ई कारन ऐं रे!

    —फिर तो कोई पुरानी याद सता रही होगी चचा! किसी से ज़्यादा उम्मीद तो नहीं लगाई? किसी ने अपमान तो नहीं किया? चची से नोंक-झोंक तो नहीं हुई? सुबह अच्छानाश्ता मिल गया था? पैसे की कमी तो नहीं अखर रही? बगीची के नौजवानों के रोज़गार की फिक़्र है क्या? औलाद की तरफ़ से कोई परेशानी? कोई रोग तो नहीं सतारहा? अरे, कहीं प्यार-प्रीत की कोई पुरानी टीस तो नहीं है? ख़ुद पे और हम पे सितम ढाते हो, खोलकर क्यों नहीं बताते हो? मन का लगना तुम्हारे हाथ में है, मनतुम्हारा तुम्हारे साथ में है। सोचना उल्टा ग़लत होता है, जो कि कांटों के बीज बोता है। जितनी सारी हैं सब फिकर छोड़ो, दुख की बातों से अपना मुंह मोड़ो। ग़मों पे क्योंन मुस्कुराते हो? ख़ुद पे और हम पे सितम ढाते हो!

    —अब का बतामैं लल्ला! तेरी बातन ते ऊर्जा सी तौ मिली। सारे सुक्ख-दुक्ख अपने ई अन्दर ऐं।

    —मेरा एक दोहा सुन लीजिए, ‘सुख ने लूटा सभी को, दुख देकर हर बार। दुख से कभी न हारना, वह सुख का आधार।’ कभी-कभी मैं भी समझा सकता हूं न आपको! अबचलिए, हम भी वोट डाल आते हैं!

     

    wonderful comments!

    1. sujeet kumar mishra जनवरी 4, 2014 at 12:07 अपराह्न

      बहुत बढ़िया गुरुदेव. क्या बात है. आजकल आप कही दर्शन नहीं दे रहे है. हम जैसो के प्रेरणास्रोत है आप. कम से कम आप के प्रोग्राम्स तो हमे पता ही होने ही चाहिए ..... गुरुदेव आप है चक्रधर ....पूरा करो ये वर .....देकर अपने दर्शन......दूर करो हमारे जीवन के घर्षण....... आपका अपना......सुजीत कुमार मिश्रा

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