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    जिनके घर कांच के बने होते हैं

    (कई बार अध्यापकगण कल्पना-लोक और यथार्थ में आते-जाते रहते हैं)

     

    पढ़ाई से भागने वाले नटखट बन्दरो!

    चलो ये वाक्य पूरा करो—

    जिनके घर कांच के बने होते हैं…..

     

    एक बोला—

    वे कहीं और जाकर सोते हैं।

    दूसरा बोला—

    वे बाहर सब कहीं देख सकते हैं।

    तीसरा बोला—

    वे दूसरों पर धूल नहीं फेंक सकते हैं।

    चौथा बोला—

    वे घर में टटोल-टटोल कर चलते हैं।

    पांचवां बोला—

    वे बिजली बंद करके कपड़े बदलते हैं।

     

    —ठीक है न श्रीमानजी?

     

    श्रीमानजी का

    कहीं और ही था ध्यान जी—

    ….पावर कट के इस ज़माने में

    बिजली होती ही कहां है,

    अंधकार चारों तरफ़ यहां से वहां है।

    आपका घर कांच का है तो क्या हुआ,

    दीजिए पावरकट को दुआ।

    बिना स्विच ऑफ़ किए कपड़े बदलिए,

    घर में नाचिए, कूदिए चाहे उछलिए।

    लेकिन बिजली अगर अचानक

    अपना जलवा दिखा गई,

    यानी यदि बीच में ही आ गई,

    ऐसे में कोई बाहर वाला आपको देखे,

    तो हो सकता है

    कांच के घर पर पत्थर फेंके।

    दृश्य अगर सचमुच उसे कसकता है….

     

    —बच्चो! हो सकता है!

    ऐसा भी हो सकता है!!

     

    —श्रीमानजी कैसा हो सकता है?

     

    wonderful comments!

    1. राजेश निर्मल Mar 3, 2013 at 11:27 pm

      हो तो बहुत कुछ सकता है महाशय। पर कहना मना है।

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