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झाड़ू सकारे कि नकारे

झाड़ू सकारे कि नकारे

 

—चौं रे चम्पू! आय गयौ? मैंने बगीची के पहलवानन की मीटिंग बुलाई ऐ। तू सबते जादा पढ़ौ-लिखौ मानौ जाय हमाई बगीची पै, चुनाव परिनामन पै कछू बोल!

—चचा, सबसे पहले तो मैं बगीची के सारे पहलवानों को, लोकतंत्र के पहरुओं को, नौजवानों को और परिवर्तन की कामना करने वाले या अब तक हुए विकास को आगे बढ़ाने वाले, सभी को बधाई देता हूं। उन्होंने इस बार भारी मात्रा में मताधिकार का प्रदर्शन किया और एक कर्त्तव्य का निर्वाह किया कि उनको वोट डालना चाहिए, सबसे पहली बात तो ये।

—तू आगे बता दूसरी! नेतान की तरियां मती बोल! बाकी प्रांतन में तौ सरकार बन जामिंगी, जे बता दिल्ली में सरकार कैसै बनैगी? बनैगी ऊ कै नायं बनैगी?

—दिल्ली के इस चुनाव में हाथ की पांचों उंगलियां मुट्ठी नहीं बन पाईं। उंगलियों में आपसी सहयोग ही नहीं रहा। हाथ अपनी रेखाओं को नहीं पढ़ पाया। कमल खिलते-खिलते रह गया, क्योंकि पानी के नीचे कमलनाल में झाड़ू की सींकों ने छेद कर दिए। खुद झाड़ू में सींकें कम पड़ रही हैं।

—कोई पाल्टी सरकार बनाइबे कूं अगाड़ी चौं नायं आय रई?

—जी, कोई भी पार्टी सत्ता की मलाई की दावेदारी नहीं कर रही है। राजनीति में भ्रष्टाचार-विरोध और स्वच्छता का आग्रह इतना बढ़ा है कि हर कोई विपक्ष कीभूमिका निभाने को आमादा है। जिसको छाछ और छूंछ समझते थे उसने अपना महत्व दिखा दिया है। कानून की किताबों में सन्नाटा पसरा है। चचा, ब्रज का सन्नाटाआप तो जानते हैं? मैं बता दूं इन बगीची के वासियों को?

—हां! बता, बता!

—हमारे गांवों में, मलाई बिलोने के बाद जो घड़े भर छाछ बचती थी, उसको बांट दिया जाता था। ज़्यादा होती थी, किसी के काम में नहीं आती थी। हर घर में मलाई निकलती थी। छाछ फिर भी फेंकते नहीं थे। एक ड्रम में भरते थे। दस खौंच नमक और सेर दो सेर मिर्च कूट कर डाल कर ढक देते थे। तब बनता था सन्नाटा। जो किसी शादी-ब्याह, मुंडन, छोछक के मौके पर पिलाया जाता था। तबियत झक्क कर देता था। आंख नाक कान से धुआं निकलता था लेकिन पाचनशक्ति बढ़ा देता था।सारे विकार दूर हो जाते थे।

—काम की बात कर चम्पू!

—काम की बात यह है कि अगर छाछ के सन्नाटे ने राजनीति का स्वास्थ्य ठीक किया है तो सत्ता के गलियारों में सन्नाटा ही रहे ये ज़रूरी तो नहीं है। आज वहां छाछ को फूंक-फूंक कर भी पीना नहीं चाहते। दूध की तरफ कोई देख ही नहीं रहा। हर कोई दिखाना चाहता है कि वह दूध का धुला हुआ है। स्वच्छ राजनीति के दंभ में कौनअपने आपको गंदा दिखाएगा और स्वयं को सत्ता का लोभी साबित करेगा। अरे भैया, खुद को दूध धुला दिखाने के लिए इतना दूध बहा दोगे तो न छाछ मिलेगी न मलाई। इसलिए दूध बहाने से ज़्यादा अच्छा है सोचना शुरू करो और देश-हित देखो। जिस रचनात्मक विपक्ष में आने को सब लालायित हैं, रचनात्मक पक्ष में भी आकर बैठो।

—कौन ते कहि रह्यौ ऐ?

—झाड़ू वाली आप पार्टी से। वे झाड़ू का बड़ा अच्छा सिम्बल लेकर आए। बंध कर रहती है उसकी एक-एक सींक, जो सांगठनिक ताक़त को बताती है। झाड़ू गरीब वर्ग का प्रतीक है। कुछ साल पहले ’मानुषी’ नाम का एनजीओ चलाने वाली मधु किश्वर ने मुझसे कहा था कि मैं झाड़ू की आरती लिख दूं। मैंने काफी सोचा। दुबारा जब उनका फोन आया तो मैंने कहा कि कोई गीत लिखवा लो, झाड़ू की आरती लिखूंगा तो वह एक पैरोडी हो जाएगी। उसमें दम नहीं आएगा। बात आई गई हो गई। मैंने झाड़ू की आरती नहीं लिखी। लेकिन अब इस चुनाव में झाड़ू ने जैसा जलवा दिखाया है, उसका अभिनन्दन होना चाहिए। झाड़ू की बारीक-बारीक सींकों ने मिलकर अपनी समझसे, अपनी बारीकी से, मज़बूती की ताक़त दिखा दी। अब इस ताक़त के आगे आने का वक़्त है।

——तौ ताकत कैसै दिखामैं?

—हाथ बाहर से समर्थन देने को तैयार है। आप कुर्सी सम्भालो और रचनात्मक पक्ष की भूमिका में आओ। अपनी गाढ़ी कमाई को दोबारा चुनाव में बहाने के बजाय विकास और आम आदमी की ज़रूरतों पर ख़र्च करो। ज़िद और अहंकार में क्या रखा है। ब्रज में झाड़ू बुहारने को सकारना कहते हैं। बोलो झाड़ू सकारे कि नकारे?


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