अशोक चक्रधर > Blog > खिली बत्तीसी > जीवन का ताप अपने आप

जीवन का ताप अपने आप

jeevan kaa taap apane aap

 

 

 

 

 

 

 

 

जीवन का ताप अपने आप

(आपसे ज़्यादा पूर्ण और महत्वपूर्ण है जीवन का ताप)

 

माफ़ करिए!

और कर सकें तो

आंखें साफ करिए।

 

कारण जो भी रहा हो,

दिमाग ने दिल से

या दिल ने दिमाग से

कुछ भी कहा हो,

कारण ठोस है,

फिलहाल मेरी उंगली पर

ये आपका आंसू नहीं है

नई सुबह की ओस है।

 

जानता हूं कि

इसमें समाई यादें

आपको बेहद तिलमिलाती हैं,

लेकिन देखिए, देखिए तो…

भविष्य की किरणें भी

यहीं झिलमिलाती हैं।

दुख के पर्वत पर

ठोस जमी हुई सदियां,

पिघल-पिघल बनती रहीं

आंसू की नदियां।

 

लेकिन रिवर्स कभी भी

रिवर्स नहीं जाती हैं,

दुख-सुख को सुख-दुख को

आगे ले जाती हैं।

 

संघर्ष की

धूप निकलते ही

यह बूंद भाप बन जाएगी,

और फिर जीवन का ताप

अपने आप बन जाएगी।

मुट्ठी तान लेंगी

आत्माएं भूखी,

लेकिन नदियों का पानी बचाएं,

आंखें रखें सूखी।

 


Comments

comments

Leave a Reply