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जीने की हर अदा के शौकीन साठे जी

जीने की हर अदा के शौकीन साठे जी

 

—चौं रे चम्पू! ऐसौ कौन सौ दान ऐ जामैं तुमारौ कछू नुकसान नायं?

—ज्ञान दान है चचा! देने से और बढता है और तुम्हारा उसमें कुछ जाता भी नहीं है।

—नायं लल्ला! अज्ञानी कूं ज्ञान देऔगे तौ तुमारौ समय लगेगौ और ज्ञानी कूं ज्ञान की दरकार ई का ऐ?

—सो तो है चचा। तो फिर…. सबसे बड़ा दान है, देहदान। इसमें तुम्हारा कोई नुकसान नहीं है।  तुम दुनिया से चले गए, तुम्हारे वंशजों का भी कोई नुकसान नहीं। न लकड़ी का खर्चा, न क्रिमेटोरियम का। न दफ़नाने का लफड़ा, न गिद्ध-कौव्वों को डालने या जल में बहाने का। अस्पताल के लोग आएंगे, देह ले जाएंगे। चिकित्सा-विज्ञान के छात्रों को जो ज्ञान मिलेगा, उससे मानवता का उद्धार होगा! अंततः बात वहीं आ गई न कि ज्ञानदान श्रेष्ठ होता है और देहदान द्वारा दिया गया ज्ञानदान सर्वश्रेष्ठ होता है। अभी ऐसा ही करके गए हैं श्री वसंत साठे।

—तोय भौत प्यार कत्ते ए न लल्ला!

—बेइंतेहा चचा!

–मुलाकात कैसै भई?

–सन इक्यासी में मैंने एक कविता लिखी थी ’बीयर नहीं पीऊंगा’, जब तक औरतों के जलने-मरने के समाचार आते रहेंगे। हास्य का जामा था, लेकिन दहेज-प्रथा से जुड़ा दर्द और आक्रोश मेरी उस मंचीय कविता में था। लोग हंसते थे और अंत में संजीदा हो जाते। उस कविता को साठे जी और उनकी पत्नी ने बहुत पसंद किया। चचा! साठे जी ने मुझे एक मुसीबत से भी निकाला था।

—वो बता!

—’बूढ़े बच्चे’ नामक एक कविता लिखी थी मैंने। उस पर आकाशवाणी के लिए ‘प्रौढ़ बच्चे’ शीर्षक से एक फीचर बनाया, जो मैंने लिखा, साक्षात्कार लिए, अपनी वाणी में प्रस्तुत किया, निर्देशित किया। सम्पादन की मशीन पर श्री के. के. नरूला के साथ बैठकर उसके पूरे निर्माण में अंत तक सक्रिय रहा। उस रूपक को आकाशवाणी की अखिल भारतीय प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ रूपक का पुरस्कार घोषित हुआ, पर हैरानी कि वहां मेरे नाम के स्थान पर उन पैक्स महोदया का नाम था जिन्होंने मुझे इस कार्य के लिए बुक करने और अपेक्षित सुविधाएं देने के अलावा कोई काम नहीं किया था। उन्हें पुरस्कार दिया जा रहा था लेखन और निर्देशन के लिए।चचा! नए उपकरणों के प्रति मेरा प्रेम बहुत पुराना है। मेरे पास प्रथम प्रसारण की कैसेट थी, जिसमें बाकायदा उद्घोषणा की गई थी कि इसका लेखक, निर्देशक, प्रस्तुतकर्ता तुम्हारा चम्पू है। पुरस्कार के निर्णय ने मुझे विचलित कर दिया। मैंने गुहार लगाई। उत्तर मिला कि ये पुरस्कार आकाशवाणी के कर्मचारियों को ही प्रोत्साहित करने के लिए होते हैं। मैंने कहा कि तो फिर उन्हें इसलिए देना चाहिए कि उनकी पहल पर यह कार्यक्रम बना, न कि इसलिए कि उन्होंने बनाया, लिखा या निर्देशित किया। केन्द्र-निदेशक ने कहा कि अब चूंकि उनके नाम की घोषणा हो गई है इसलिए उन्हीं को मिलेगा। महानिदेशक बोले कि कोई विवाद हुआ तो हम अगले वाले को दे देंगे। मैंने कहा इसमें कोई विवाद है ही नहीं। किसी के श्रम की लाश पर कोई अपना झंडा कैसे गाड़ सकता है? भला हो मित्र कवि सुरेन्द्र शर्मा का कि वे मुझे साठे जी के पास ले गए। साठे जी ने पूरी कहानी धैर्यसे सुनी, टेप भी सुना। उन्होंने तत्काल निर्णय बदल दिया और वह पुरस्कार सन तिरासी में विज्ञान भवन में तुम्हारे चम्पू को मिला। ये बात दूसरी है कि आकाशवाणी के तत्कालीन अधिकारियों ने मेरे सुमधुर बैन एक-दोसाल के लिए बैन कर दिए। बहरहाल, मैं साठे जी का पसंदीदा कवि हो गया। उन्हें मेरी एक नहीं अधिकांश कविताओं के प्रसंग संदर्भ याद थे। उनके ज़माने में टेलीविजन रंगीन हुआ। उन्हीं के समय में दूरदर्शन परहास्य-व्यंग्य कविसम्मेलनों की शुरुआत हुई।

—हां खूब देखे हमनैं!

—उन्होंने ही मुझे ऊर्जा मंत्रालय की हिन्दी सलाहकार समिति का सदस्य बनाया। कविसम्मेलन की वाचिक परंपरा उन्हें बहुत भाती थी। जयजयवंती’ की गोष्ठियों में वे निरंतर आते रहे। चचा! उन जैसा राजनेता मैंने नहीं देखा, जो विद्वान हो, कला संगीत संस्कृति-प्रेमी हो और जीवन को जीने की हर अदा का शौकीन भी हो। एक महीने पहले ही तो ‘परम्परा’ के कार्यक्रम में उनसे मुलाकात हुई थी। अचानक देहदान कर गए, मैं उस महान व्यक्ति को प्रणाम करता हूं।

 


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