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हृदय की ज़मीन पर नाचती मीरा

हृदय की ज़मीन पर नाचती मीरा

 

—चौं रे चम्पू! आज बज़ट की उपलब्धीन ते अलग कोई कथा हतै तेरे पास?

—कथा नहीं है, ’कथा’ नाम की पत्रिका है। इसके संस्थापक संपादक कथाकार मार्कंडेय थे, आजकल इसे अनुज निकाल रहे हैं। अनुज जामिआ मिल्लिआ इस्लामिआ मेंमेरे शोधछात्र रहे हैं। ‘दूरदर्शन की हिन्दी : अभिव्यक्ति एवं प्रस्तुति-कला’ विषय पर उन्नीस सौ पिच्चानवै में पंजीकरण कराया था। अच्छी गति से कार्य किया औरजल्दी ही पीएच-डी उपाधि पा गए। अभिव्यक्ति एवं प्रस्तुति-कला के ज्ञान की एक निदर्शना यह है कि अपने नाम के आगे ‘डॉ.’ नहीं लगाते। नाम के पीछे का कुमारभी हटा दिया। यानी नाम के आगे-पीछे के सम्मानों से कोई लगाव नहीं। अच्छा काम करने की तमन्नाओं से लबरेज़ रहते हैं।

—का अच्छौ काम कियौ?

—‘कथा’ के बैनर तले, उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हिंदी संस्थान के साथ मिलकर राजस्थान की राजधानी जयपुर में भक्त कवि मीराबाई पर एक सेमिनारकराया। अनुज ने मुझे भी न्यौता दिया। वे मानते हैं कि आज मीराबाई को और भी गहराई से समझने की दरकार है।

—चौं, अब ताईं नायं समझे का मीराबाई कूं?

—समझे तो हैं, पर भक्ति की भावुकता के साथ। आज के साहित्यिक विमर्शों के समानांतर मीरा को नहीं देखा गया। मीरा की कथा के सारे पहलू नहीं खंगाले गए।जबकि आज के दौर के सभी विमर्शों से मीरा जुड़ती हुई दिखाई देती हैं। वर्तमान व्यथा की बहुत कथाएं निकलती हैं मीरा के काव्य से। इसलिए अनुज ने ‘कथा’ कामीराबाई पर विशेष अंक निकाला। काफ़ी चर्चित हुआ। सेमिनार में भी लगभग उन्हीं मुद्दों पर चर्चा हुई जो ’कथा’ के इस अंक में थे।

—कौन कौन सौ मुद्दा उठौ, बता।

—याद होगा आपको कि गुलज़ार ने मीरा पर एक फ़िल्म बनाई थी। शायद वहीं से मीरा पर नए सिरे से चिंतन प्रारंभ हुआ। गुलज़ार मानते थे कि मीरा के काव्य मेंबाक़ायदा सोशल कंसर्न हैं। लोकप्रिय सिनेमा की अपनी सीमा होती है। कई स्तरों पर भावनाओं का सरलीकरण होता है, तो जबरीमल्ल पारख ने कहा कि गुलज़ार की‘मीरा’ स्त्री-मुक्ति का औसत व्याख्यान है। मीरा-विमर्श और चलना चाहिए। विश्वनाथ त्रिपाठी जी को दिखा कि मीरा की भक्ति ने एक नए जेंडर का निर्माण कियाहै। किसी ने मीरा के काव्य को स्त्री-स्वतंत्रता और संघर्ष का काव्य माना। किसी ने कहा कि वे विद्रोहिणी थीं। किसी ने उन्हें भक्ति का आध्यात्मिक विपणन मानातो किसी को काम-भावना की काव्यात्मक अभिव्यक्ति दिखी। अनामिका ने मनचीते परमपुरुष की कामना में आसन्न पुरुष का क्रिटीक प्रस्तुत किया। अल्पना मिश्रने कहा कि वहां तिनके की ओट से स्त्री साहस का दमकता संसार है।

—तू का सोचै?

—चचा, मध्यकालीन दौर में स्त्री की क्या स्थिति थी, यह सोचना वाजिब है, पर मुझे नहीं लगता कि अगर उन्होंने पैरों में घुंघरू बांधे थे तो इसलिए कि स्त्री के पैरों में पड़ी बेड़ियों को तोड़ना है। मुझे नहीं लगता कि उन्हें किसी सामाजिक आंदोलन की नेत्री बनना था। पग में घुंघरू बांधकर वे प्रेम-दीवानी हो गईं थीं। लोगों ने कुछ भीकहा, सास ने कुलनाशिनी कहा, समाज ने ग़लत माना पर वे अपनी धुन में मगन थीं। विष का प्याला आया, नहीं आया, ये ऐतिहासिक खोज के विषय हैं। वे तो कृष्णमयी थीं और दर्शन की प्यासी रहती थीं। उनके प्रभु गिरधर नागर थे, उनके अलावा कोई और नहीं। परमपुरुष एक ही था और कोई दूसरा नहीं, यह उनका मूलमंत्र था।  जब चेतना-गायकी में ‘दूसरौ न कोई’ था, तो उद्देश्य भी ‘दूसरौ न कोई’ था? प्रेम उनके काव्य का मुख्य प्रोडक्ट है, विद्रोह बाईप्रोडक्ट। मीरा हृदय की ज़मीननाचती हुई एक ऐसी ताक़त का नाम है जिसे कोई हरा नहीं सकता।

—नामबर जी का बोले।

—वही बोले जो पहले भी बोल चुके थे, लिख चुके थे। पर अद्भुत वक्ता हैं नामवर जी। सरलता में जटिल समीक्षाई करते हैं। उन्होंने कहा कि मीरा जानती थीं कि उनकादर्द कोई नहीं जानता। सूली ऊपर है सेज पिया की। हिन्दी में ऐसी उपमा किसी ने नहीं दी है। एक भी मुश्किल शब्द नहीं है। ये जो सादगी है, दिल से साफ है, शब्द भी साफ हैं। सीधे तीर की तरह से जबान से निकलने वाला भाषा है। दो टूक बात, कोई उलझाव नहीं, सीधी प्रेम की प्रभावशाली वाणी। नामवर जी से सहमत हूं चचा, उनसेनहीं जो प्रेम की ताक़त नहीं जानते।

 


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