अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > हिन्दी की हिचक, हिचकी और हिचकोले

हिन्दी की हिचक, हिचकी और हिचकोले

हिन्दी की हिचक, हिचकी और हिचकोले

 

—चौं रे चम्पू! सुनायगौ कछू नई पुरानी?

—चचा, विश्व हिन्दी दिवस दस जनवरी को मनाया गया। ये बात न तो बहुत नई है, न बहुत पुरानी। कैसे मना? न तो अख़बारों में कोई ख़ास विज्ञापन, न शिक्षा संस्थानों को विशेष जानकारियां, न कोई उल्लास, न कोई उत्सवधर्मिता। हिन्दी जो अस्सी प्रतिशत हमारी सम्पर्क भाषा है, जोशत-प्रतिशत संविधानसम्मत हमारी राजभाषा है। प्रतिशतों से बहुत ऊपर हृदय से मानो तो हमारी राष्ट्रभाषा है।

—अरे तौ चौदह सितम्बर मनाय कै ऊ कौन से निहाल है रए ऐं?

—बात वो नहीं है चचा। आप हिन्दी को वैश्विक-भाषा बनाने के ऊंचे-ऊंचे सपने देखते हैं। उसमें कहीं तो कोई इच्छाशक्ति भी दिखाई देनी चाहिए। दस जनवरी से ही तीन दिन का एक अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी उत्सव हुआ। उसके समाचार उन अख़बारों में छप गए, जिन्होंने उत्सव को स्पोंसर किया था।उस उत्सव के उद्घाटन समारोह में भारतीय अनुवाद ब्यूरो के डॉ. एस. एन. सिंह ने एक ऐसी बात कही जिसे दृश्य के रूप में देखा करता हूं। उन्होंने कहा कि हिन्दी एक हिचकोले खाती हुई भाषा है। अब, हिचकोला चचा, भंवर में नैया खाती है या हिचकोला होता है झूले की पींग या झोटा। भंवरमें हिचकोले खाती नैया संकटग्रस्त होती है और पींग ऊंचाई तक ले जाने वाला हिचकोले खिलाने वाला झूला मदमस्त होता है। विदेशों में तो रोलर कोस्टर पर पूरा ही घुमा देते हैं और इतनी तेज़ गति से काम करते हैं कि हैरानी होती है। चीन में मंडारिन के रोलर कोस्टर घूमे, पूरे देश में मंडारिनदौड़ रही है तेज़ रफ्तार और हम एक डाल पर हिचकोले ही ले रहे हैं, लेकिन झूले का हिचकोला भी बड़ी मस्त चीज है चचा।

—सो कैसे? बता लल्ला।

—माना कि कई बार लगता है कि हिन्दी की स्थिति, ऊंचाई की ओर जा रही है। बोलने वाले सबसे ज़्यादा हैं, धारावाहिकों, फिल्मों के ज़रिए फैल रही है। पूरे विश्व में घूम रही है। जैसे ही वो झूला नीचे उतरकर आता है तो पता लगता है कि शिक्षा से गायब हो रही है और अपनी अनिवार्यता खोरही है। अंग्रेजी के वर्चस्व की पटरी के तले दब गई है। लेकिन जन-जीवन फिर उसको दूसरी तरफ हिचकोला देता है और दूसरी तरफ ऊंचाई पर चढ़ जाती है। एक और चीज पर आपने ध्यान दिया होगा चचा?

—सो का लल्ला?

—झूला जब अपनी सर्वोच्च ऊंचाई पर होता है तो तत्काल लौटकर नहीं आता, पलांश के लिए वहां ठहरता है, तब नीचे आता है। दूसरी तरफ जाकर भी ठहरता है। रोलर कोस्टर में ये ठहराव नहीं होता। वह ठहरता वहीं है जहां से प्रस्थान करता है। हम कई बार ऊंचाई पर जाकर ठहर जाते हैं,लेकिन उससे और भी ऊपर जाना होता है, लेकिन नीचे आ जाते हैं। एक और सत्र, जिसका शीर्षक था दो हजार पचास में हिन्दी और भारतीय भाषाओं की स्थिति। चाय के दौरान एक विद्वान बतिया रहे थे कि सन दो हजार पचास में हिन्दी की हिचकियां आएंगी, हिचकोले नहीं। याद आया करेगीकि हिन्दी भी कोई भाषा थी। यानी वो अंतिम हिचकियां दो हज़ार पचास से पहले ले चुकी होगी।

—अरे ऐसे कारे म्हौं वारेन कूं तौ अंतिम हिचकी कल्ल ई आ जाय लल्ला!

—चचा, ऐसा श्राप तो न दो। वे भी शायद हिन्दी के हित में ही बोल रहे होंगे। कई बार नकारात्मक तस्वीर दिखाने से भी हम सकारात्मक सक्रिय हो जाते हैं,

लेकिन ये सोचना एकदम ग़लत है कि हिन्दी सिर्फ़ याद आने वाली भाषा या सिर्फ ग़रीबों, मुंफलिसों, सब्जीवालों, रिक्शेवालों की भाषारह जाएगी।

उनसे ये पूछा जाए कि क्या सन दो हजार पचास तक हमारा देश ग़रीब ही बना रहेगा। दरसल चचा,

हिचकोले और हिचकी से ज़्यादा बड़ी शत्रु है हिन्दी के लिए हिचक। अब मैं क्या करूं कि हिन्दी का कार्य देखने वाले अधिकांश अधिकारी मित्र हैं,

लेकिन अगर उनकी हिचक समाप्तहो तो हिन्दी की प्रगति कोई नहीं रोक सकता। आज कम्प्यूटर एक ऐसा साथी हमें मिला है

जो हर क़दम पर हिन्दी के विकास के लिए कटिबद्ध है। काश कि जो हिचकियां पचास साल बाद आने वाली हैं,

वो इन अधिकारियों को कल से शुरू हो जाएं। जब भी हिचकी आए तो याद आए कि हिन्दीमें काम करना है।

 


Comments

comments

Leave a Reply