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  • चौं रे चम्पू
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  • हंसना बड़ा काम
  • –चौं रे चम्पू! तू दिन में कित्ती बार हंसै?

    —सवाल ग़लत है, आपको पूछना चाहिए कि तू कितनी बार हंसाता है! मैं समझता हूं… या कहूं कि मैं समझता था कि हंसना बड़ा काम नहीं है, हंसाना बड़ा काम है। आज गुरु-पूर्णिमा है, कोई अदृश्य गुरु मुझे बता रहा है कि हंसाना बड़ा काम नहीं है, हंसना बड़ा काम है। हाँ चचा! मुझे अब हंसना बड़ा काम लगने लगा है। सिद्धू को हंसना आता था, उनकी हंसी पर लोगों को हंसना आता था। मुझे न तो सिद्धू की हंसी के साथ कभी हंसी आई, न उनके साथ हंसने वाले अन्य बुद्धुओं के साथ आई। इन्हें देखकर जो व्यंग्य से हंसते हैं उन्हें देखकर हल्की सी मुस्कान ज़रूर आती है। हालांकि अपनी एक कविता में बहुत पहले कभी मैंने कहा था…

    —का कह्यौ तैनैं?

    —मैंने कहा था, ‘हंसी एक छूत का रोग है, हंसी एक सामूहिक भोग है। तुम हंसोगे तो तुम्हारे साथ हंसेगा पूरा ज़माना। रोओगे तो अकेले में पड़ेगा आंसू बहाना।’ हंसी के बारे में एक लम्बी कविता थी, उसका अंश है ये। लेकिन चचा, हंसी के बारे में अब नए सिरे से सोचना पड़ेगा। गुरु अदृश्य है। अन्दर खोजना पड़ेगा। मुझे लगता है सिद्धू हंसाते-हंसाते बोर इसलिए हो गए कि हंसने-हंसाने से जो कमाई कम हो रही थी, उसपर उन्हें रोना आने लगा होगा। अब ज़्यादा कमाई वाले क्षेत्र ने पुकारा है। नकली हंसियों का दौर समाप्त हो जाएगा। जब जनता रोएगी तब क्या सिद्धू हंस पाएंगे? नकली ही सही, कुर्सी पर बैठकर उन्हें जनता के साथ रोना होगा। उन्हें रोता देख शायद मुझे सात्विक हंसी आ जाए और मेरे अदृश्य गुरु प्रसन्न हो जाएं।

    —अरे लल्ला, तू बी अजीब ऐ!

    —हंसाना व्यवसाय का हर कारोबारी अजीब होता है चचा। हंसाना अच्छा है, हंसना और भी अच्छा है, पर इस बात पर तो हम नहीं हंस सकते कि देश के सत्तावन प्रतिशत डॉक्टरों के पास मेडिकल की डिग्री नहीं है। कोई मुझे हंसा कर दिखाए। मैं ये बड़ा काम करना चाहता हूं।

    —जे लै लोटा, बड़ौ काम करि कै आ! तेरे दिमाग़ में कब्ज़ है गई ऐ!

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