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हम सब सम्मानित होते हैं

हम सब सम्मानित होते हैं

—चौं रे चम्पू! हिन्दी जगत कौ कोई समाचार हतै का तेरे पास?

—चचा, हिन्दी जगत तो गतिविधियों से लबरेज़ है। हिन्दी के स्वर अंतरिक्ष में गूंजते रहते हैं। पूरा देश हिन्दी बोलता है। पर कोई-कोई ही है जो उसके पक्ष में मुंह खोलता है। मैं हिन्दी की दुनिया का तुम्हारा एक अदना सा चम्पू हूं। हिन्दी का पक्ष लेने वाले प्यारे कथाकार अरुण प्रकाश नहीं रहे, ये एक समाचार है। दूसरा समाचार ये कि साउथ अफ्रीका में सितम्बर में होने जा रहे नवें विश्व हिंदीसम्मेलन की तैयारियां शुरू हो गई हैं। तीसरा ये कि राष्ट्रपति भवन में केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा हिन्दी सेवियों को सम्मानित किया गया। मैं भी था वहां। चचा, एक जगह तो मुझे आंसू ही आ गए।

—काहे बात पै आए आंसू? हिन्दी की दुरदसा पै?

—नहीं चचा, हिन्दी की सम्पन्नता और उसके वैभव पर! खुशी के आंसू! पहली बार दूरदर्शन ने इस समारोह का सीधा प्रसारण किया। एक-एक करके ऐसे विद्वानों को सम्मानित किया गया जिनका हिन्दी के प्रचार-प्रसार और रचनात्मक संवर्धन में अच्छा योगदान रहा है। प्रो. यशपाल जैसे मनस्वी विज्ञान-गुरु सम्मानित हुए, जो बच्चों को जीवन और साइंस के अंतर्सम्बन्ध समझाते रहे। खगोल में जाने के लिए बच्चों की कल्पनाओं का भूगोल विकसित करते रहे। कवियों आलोचकों, मीडियाकर्मियों को सम्मान मिला। अनेक विधाओं के धुरंधर लोग सम्मानित किए गए। इस बात के लिए संस्थान की चयन-समितियों को दाद देनी पड़ेगी। श्याम बेनेगल को चुना गया। वे मूलतः हिन्दीभाषी नहीं हैं, लेकिन सिनेमा के माध्यम से उन्होंने हिन्दी की कितनी सेवा की है, ये वे भी नहीं जानते होंगे। ‘भारत एक खोज’ की हिन्दी सुनकर हमारी कई पीढ़ियां जवान हो गईं। नेहरु जी द्वारा रेखांकित किए गए राष्ट्रीय मानकीकृत जीवन-मूल्य किताबों में ही क़ैद रहते, उनकी आस्थाओं को श्याम बेनेगल ने हिन्दी के ज़रिए जन-जन तक पहुंचा दिया। इसी तरह गिरीश कर्नाड। भारत की संस्कृति को हिन्दी के माध्यम से समझाने का जो कार्य गिरीश कर्नाड ने किया ऐसा हिन्दी का अप्रत्यक्षप्रचारक कौन होगा? सिनेमा और जनसंचार माध्यमों के लोग हिन्दी का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं, ऐसा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान ने पहली बार माना है। ये खुशी की बात थी।

—तौ जा बात पे निकरे तेरे आंसू कै अब ताईं चौं नायं मानौ?

—नहीं चचा, इस बात पर भी नहीं निकले। मेरे आंसू एक अप्रत्याशित क्षण में अचानक निकले। कि मैं आपको क्या बखान करूं। चचा, रोना मुझे उस समय आया जब अपनी व्हीलचेयर पर प्रो. गोपाल राय पुरस्कार लेने गए। शारीरिक रूप से कोई अशक्त होता है और उसका मन कर रहा होता है कि वह चलकर उसी तरह पुरस्कार ले, जैसे दूसरे ले रहे हैं, तो पीड़ा की एक हल्की सी परतचेहरे पर चढ़ जाती है। कोई ऐसा व्यक्ति जो जीवन भर स्वस्थ शरीर स्वस्थ मन के साथ अपने विद्यार्थियों को सम्बोधित करता रहा हो, पराश्रित हो जाए, वह पीड़ा देखी मैंने उस समय जब उनकी व्हील चेयर मेरे सामने से गुज़री। जब वे पुरस्कृत हो रहे थे, पूरा सभागार तालियां बजा रहा था, राष्ट्रपति महोदया ने उनको शॉल पहनाया, ताम्र-पत्र दिया। सम्मान लेने के बाद जब व्हीलचेयर मुड़ी तो उनके चेहरे पर एक दीप्ति मैंने देखी। जैसे किसी बच्चे को पुरस्कार मिला हो। उनके चेहरे पर आते हुए उनके इन दो विरोधी भावों के बीच में कहीं मेरा आंसू अटका हुआ था, जिसे मैंने छिपाया भी नहीं, चश्मा उतारा और आंसू पोंछे। डॉ. गोपाल राय को मैंने तब से जाना है जब से साहित्य-जगत में आंख खोली है। उपन्यास कहानी का इतिहास, गल्प का शिल्प मैंने इनकी किताबों से जाना। हम धीरे-धीरे स्वयं इतिहास होते जा रहे हैं, लेकिन ख़ास बात ये है कि ऐसे विद्वानों को अगर सम्मानित किया जाता है तो वे सम्मानित नहीं होते, हिन्दी सम्मानित होती है और हम सब सम्मानित होते हैं, जो इन परम्पराओं और इन लेखकों को प्यार करते हैं। मुझे अपने उन आंसुओं पर भी गर्व है। मैं अपने आंसुओं से हिन्दी की दुर्दशा को धोना चाहता हूं चचा।


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