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हा हुसैन हम न हुए

हा हुसैन हम न हुए

—चौं रे चम्पू! इत्ती देर ते गुम्मा सौ बैठौ ऐ, कभी उदास है जाय, कभी मुस्काय, चक्कर का ऐ?

—चचा, एक पत्रिका-संपादक से सुबह-सुबह फोन पर तथ्याधारित बात हो रही थी, पर अचानक  उन्होंने आवेश में आकर, ‘करना है जो कर लो’, कहा और फोन काट दिया।

—तेरे खिलाफ छापौ का कछू?

—हां चचा! पिछले कुछ सालों से मेरी निन्दा के बिना उनकी पत्रिका पूरी नहीं होती। मैं और जो हूं सो हूं, पर हास्य-कवि होने पर भी मुझे गर्व है। वे हास्य-कवि का इस्तेमाल गाली की तरह करते हैं। इस बार उन्होंने तुम्हारे चम्पू और उसके परिवार के बारे में बड़ा ही नकारात्मक और तथ्यविहीन लेख छाप दिया। अपमानबोध पर उदासी छा जाती है और उनके अधकचरे ज्ञान और व्यक्तिगत दुराग्रहों की ईर्ष्याजन्य भावनाओं पर हंसी आती है। माना कि इस भूमण्डलीकरण के बाद तनाव दुनियाभर के लिए एक अपरिहार्य अंगरखा है, लेकिन ज़िन्दा रहने की मजबूरी में अंग-प्रत्यंग का हंसना भी अनिवार्य बना रखा है। हमारी कॉलोनी में सुबह-सुबह पार्क में योग की कक्षाएं चलती हैं। लाउडस्पीकर पर बेसुरे प्रवचन होते हैं। चिंतन-मुक्त और निर्विकार होने की सलाह दी जाती है। शांत मन से सांस खींचिए-छोड़िए। अकारण हंसने को कहा जाता है। मेरे साथ कम से कम ये तो है कि मेरी उदासी और हंसी दोनों सकारण हैं।

—लल्ला, सम्पादक की बात बता।

—अपने पुराने मित्र हैं, नाम है श्रीयुत् पंकज बिष्ट। जुलाई सन दो हज़ार सात तक उनसे सामान्य मधुर संबंध थे। निर्मल मुस्कानों का आदान-प्रदान होता था। पैंतीस साल पहले एक कथा-संग्रह प्रकाशित हुआ था, ‘अंधेरे से’। श्रीयुत् पंकज बिष्ट और डॉ. असग़र वजाहत दो कहानीकारों का संयुक्त प्रयास। दोनों लेखकों की वह पहली पुस्तक थी और तुम्हारा चम्पू उनका पहला समीक्षक था। सन छियत्तर के प्रतिमान-2 में मेरा एक लम्बा समीक्षा-लेख छपा। मैंने लिखा था, ‘पंकज बिष्ट क्रोध से मेज़ में घूंसा मारा जाना दिखाते हैं तो असग़र वजाहत घूंसा मारने के बाद देर तक मेज़ का हिलना दिखाते हैं।’ आवेश में आकर घूंसा मारना हमारे बिष्ट जी का पुराना बिम्ब है। पूरी पत्रिका लात-घूंसों से लबरेज़ रहती है। आचार-संहिता गई तेल-व्यापार करने! ये नहीं देखा जाता है कि किसी की मानहानि भी हो सकती है। व्यक्तिगत टिप्पणियों से दिल टूट सकता है। लगातार विरोध में छाप रहे हो। मीडिया-संहिता का तकाज़ा होता है कि किसी की जान लेने से पहले उस व्यक्ति से भी तथ्य जान लो। उन्हें कोई चिंता नहीं। न करें चिंता, पर इतना सुन लें कि हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार अभियान और संयुक्त वैश्विक प्रयत्नों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते। माना कि आज अंग्रेज़ी के बढ़ते वर्चस्व के कारण हम आत्ममुग्ध मनमोदक नहीं बन सकते पर सोचिए! आख़िर कब तक हिन्दी की दरिद्रता के रोदक बने रहेंगे। हिन्दी एक समृद्ध वैश्विक भाषा है, अंतरराष्ट्रीय सभा-संगोष्ठियां तो होंगी ही। आप नहीं जा सके, अफ़सोस! तुम्हारा चम्पू जुलाई सात में न्यूयार्क में हुए आठवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की सत्र-उपसमिति का संयोजक था। श्रीमती चित्रा मुद्गल और डॉ. रामशरण जोशी सदस्य थे। किस सत्र में कौन बोलेंगे, पूरा ख़ाका तैयार किया गया। जोशी जी के प्रस्ताव पर एक सत्र के लिए श्रीयुत् पंकज बिष्ट का नाम भी रखा गया। सरकार को जो सूची भेजी गई उसमें इनका नाम बाकायदे दर्ज था। अब निर्णय लेने के सारे अधिकार तो तुम्हारे चम्पू के पास नहीं थे न! उपसमिति के ऊपर एक समिति, समिति के ऊपर पूरा तंत्र। भेजे जाने वाले लोगों की संख्या सीमित होती है, प्रयत्न करने वाले लोगों की असीमित। बहरहाल, श्रीयुत् पंकज बिष्ट का नाम सूची में नहीं आ सका। बस तबसे व्यक्तिगत आक्षेप, अतार्किक तथ्यविहीन टिप्पणियां और आक्रामक अपमानजनक भाषा। उनकी पीड़ा वही कि हा हुसैन वहां हम न हुए।

—अरे रहन्दै लल्ला! तू तौ दिल ते लगाय बैठौ। काम कर और आगे बढ़।

—चचा, वही तो! लक्ष्य सामने होता है, व्यक्ति सामने नहीं होते। मैं जिन भी पदों पर हूं, वहां जो मुझसे बन पड़ेगा, करूंगा।

—ठीक ऐ चम्पू! तू तौ मस्त चाल ते चलतौ चलौ जा और हिन्दी कौ परचम लै कै भूमण्डल की परकम्मा लगा। पीछै मुड़ि कै मती देखियो रे! चक्कर लगाय कै यहीं पै आ जा।

 


 


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