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घुमंतू के लेकिन किंतु परंतु

—चौं रे चम्पू! आगरा ते कब आयौ?

—आगरा के बाद तो लखनऊ भी हो आया चचा!

—लखनऊ मैं का हतो?

—इस्पात मंत्रालय द्वारा आयोजित राजभाषा संगोष्ठी थी। विषय था, ‘इस्पात प्रौद्यौगिकी में तकनीकी शब्दावली’। देशभर में इनके जितने उपक्रम हैं सबके राजभाषा अधिकारी वहां आए हुए थे। दिन में यूनिकोड के प्रयोग पर चर्चाएं हुईं, शाम को हुई कविगोष्ठी। मुझे इस्पात मंत्री श्री बेनी प्रसाद वर्मा का नज़रिया अच्छा लगा। उनका मानना था कि तकनीकी शब्दावली के लिए हर शब्द का हिन्दी अनुवाद करने की आवश्यकता नहीं है। जो तकनीकी शब्द अंग़्रेज़ी भाषा के हैं, उन्हें देवनागरी लिपि में लिखिए। मैंने सभी उपक्रमों की स्मारिकाएं देखीं। उनमें छपी रिपोर्ट्स में इसी नीति का अनुपालन हुआ था। अधिकांश आलेखों में अंग्रेज़ी और उर्दू के शब्दों का प्रयोग था। जैसे एक शब्द-पद था ‘प्रोजैक्टेड लक्ष्य के फ़ायदे’। इसे ऐसे भी लिखा जा सकता था, ‘प्रक्षेपित लक्ष्य के लाभ’। ‘प्रक्षेपित’ के स्थान पर ‘प्रोजैक्टेड’ पर मुझे कोई आपत्ति नहीं है, क्योंकि जिन इंजीनियरों के लिए वह पत्रिकाएं थीं, उनके लिए ‘प्रोजैक्टेड’ ही सुगम है। हां, ‘फ़ायदे’ के स्थान पर ‘लाभ’ हो सकता था। लाभ कोई अपरिचित शब्द नहीं है। पर ‘फ़ायदे’ शब्द में भी कैसा नफ़ा-नुकसान। जीवन में दोनों शब्द चलते हैं। भाषा के प्रति एक उदारवादी सोच, इस समय की मांग है। शुद्धतावादियों को नाक-भौं नहीं सिकोड़ने चाहिए। अब तो साहित्यिक कृतियों में भी शुद्धता का आग्रह नहीं रहा।

—अब दिल्ली में टिकैगौ कै कहीं जायगौ?

—कल बड़ौदा जाऊंगा। स्कूल के बच्चों के बीच।

—बड़ौ ई घुमंतू ऐ? आगरा मैं का भयौ?

—ताजमहोत्सव का कविसम्मेलन था। बीस कवियों की लम्बी सूची। आगरा के श्रोता धुरंधर कविता प्रेमी हैं। गीतकार सोम ठाकुर सुरुचिपूर्ण कविसम्मेलनों के लिए पिछले साठ साल से सक्रिय हैं। इस मंच पर नीरज जी भी थे और उदय प्रताप सिंह जी भी। तीनों की उपस्थिति में वैसे भी नए कवियों में लतीफों का रायता फैलाने का साहस नहीं हुआ। आपने मुझे घुमंतू कहा, इससे याद आया कि आगरा में ‘आराधना’ नाम की एक संस्था है, जो घुमंतू जातियों में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए अच्छा काम कर रही है। दिन में कवि पवन आगरी और संदीप अग्रवाल मुझे पत्रकार सम्मेलन के लिए वहां ले गए थे।

—घुमंतू तौ गाड़िया-लुहार होयौ करैं।

—ठीक कहा आपने। ख़ुद को राणा प्रताप का वंशज बताने वाले ये लुहार अपना घर नहीं बनाते। किसी भी शहर में कुछ वर्षों के लिए अपनी गाड़ियां खड़ी कर देते हैं, और जब तक शहर की ज़रूरतें पूरी हों, या उन्हें वहां से खदेड़ न दिया जाए, तब तक वहीं बने रहते हैं। ‘आराधना’ की महासचिव डॉ. हृदेश चौधरी हैं और अध्यक्ष हैं पवन आगरी। इस संस्था का लक्ष्य है, घुमंतू जातियों के बच्चों को अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवनस्तर दिलवाना। हृदेश एक गृहणी हैं लेकिन तन-मन-धन से अपने अभियान पर लगी हुई हैं। वे मानती हैं कि इस जाति को अब तक उनका हक नहीं मिला है। आज़ादी मिले छियासठ साल से अधिक हो गए, लेकिन नागरिकता के अधिकार नहीं हैं, घुमंतुओं के पास। पांच हज़ार गाड़िया लुहार अकेले आगरा जनपद में हैं। देश में आठ करोड़ से बड़ी आबादी है घुमंतुओं की लेकिन न तो राशन है, न राशन कार्ड। न जीने के आधार हैं, न आधार कार्ड। मताधिकार तो दूर की बात है। सिर्फ़ गाड़िया लुहार ही नहीं, पांच सौ से अधिक घुमंतू जातियां हैं भारत में।

—घुमंतू जाति हमाए देस में ई ऐं कै बाहर ऊ हतैं?

—बाहर भी हैं, अफ्रीका, अमरीका, नेपाल, ऑस्ट्रेलिया, पाकिस्तान, मिडिल ईस्ट और तुर्की जैसे देशों में भी पाई जाती हैं। सबके अलग-अलग राणा प्रताप होंगे। विश्व में विभिन्न समाजों की रचनाएं भी बड़ी दिलचस्प हैं चचा। बहरहाल, ‘आराधना’ की पाठशाला में प्रतिदिन सौ विद्यार्थी आते हैं। हृदेश बड़े उत्साह से बताती हैं कि राहुल के पिता को कागज़ों से बहुत डर लगता था, अब वह कॉपी में उन्हें बिक्री का हिसाब दिखाता है तो खुश होते हैं। आरती स्लेट पर अपने मन की बात लिखकर दिखाती है कि बड़ी दीदी को भी पढ़ना सिखाइए। बच्चों के जीवन में परिवर्तन की नूतन बयार आ रही है। घुमंतुओं को मुख्य धारा में लाने के लिए शासन के लेकिन, किंतु और परंतुओं से भी लड़ रही हैं हृदेश।

—मेरी बधाई दइयो!


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