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गुदगुदी ठहाकों के बीच भविष्य

गुदगुदी ठहाकों के बीच भविष्य

—चौं रे चम्पू! सुनी ऐ कै ओमप्रकास बाल्मीकि ऊ बिदा है गए। कोई किताब पढ़ी बिनकी?

—‘जूठन’, उनकी आत्मकथा पढ़कर तो मैं हिल गया था। इस पिछले पच्चीस-तीस दिन से वैसे ही हिला हुआ हूं। मौत भी हिन्दी के वरिष्ठ लेखकों के पीछे ही पड गई है। मैं कल ज़िंदगी की तलाश में निकला। शायद वहां मिले जहां सब बराबर हों, खिलखिलाते हुए। जाति, धर्म, वर्ण, दलित, सवर्ण इन सारे सवालों के व्यावहारारिकऔर सकारात्मक उत्तर देते हुए।

—तू का कहि रह्यौ ऐ, कछू समझ में नायं आय रई तेरी बात।

—हमेशा ऐसा तो नहीं रहेगा चचा, जैसा कि अब तक हुआ है या जैसा कि हो रहा है। जो होना है और जो होगा, वह ज़्यादा महत्वपूर्ण है। अतीत की कब्रों से कंकाल निकाल कर उनमें कोड़े लगाना कभी-कभी वाजिब लगता है क्योंकि इन्हीं कंकालों के अत्याचारों ने असंख्य लोगों को कंगाल और अंतत: कंकाल बनाया होगा। कितना दमन, कितना अत्याचार, कितना शोषण हुआ वर्णवादी व्यवस्था में, सोचो तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन ज़िंदगी को उल्लास चाहिए। मैंने मॉरीशस में देखा था कि जब किसी घर में मृत्यु होती थी तो उसके घर के आगे लोग अपने घर की मेज-कुर्सी डाल देते थे, उत्सव मनाते थे, जुआ खेलते थे। मेला तब तक चलता था जब तक दुर्गम पर्वतों को पार करके रिश्तेदार न आ जाएं। उस छोटे से देश में भी पैदल चल कर आने में दो-तीन दिन लग जाते थे। तब तक अडौसी-पडौसी घर के आगे हंसते-खिलखिलाते थे और ठहाके लगाते थे।

—जे तौ अजीब बात ऐ रे!

—उनका मानना है कि ऐसा करने से मौत भाग जाती है। अच्छा हुआ कि मुझे भी एक शरणगाह मिल गई। पिछले दिनों एक उत्साही युवक मिला, नाम सिद्धांत मागो। उसने बताया कि चार महीने पहले कुछ मित्रों ने मिलकर ‘पच’ नाम का एक पोएट्री क्लब बनाया है। लगभग पचास युवा कवि हैं जो सप्ताह में एक बार कहीं मिलते हैं और कविता और हंसी का उत्सव मनाते हैं। मेरी जिज्ञासा बढ़ गई और मैं सचमुच कल उन लोगों के बीच पहुंच गया। कला, संस्कृति, व्यापार, वाणिज्य, सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, एडवर्टाइजिंग के क्षेत्र के लगभग तीस-पैंतीस युवक-युवती जमा थे। मुझे देखते ही खिल उठे और फिर जी मैंने सुनी उनकी कविताएं।

—तैंनै अपनी सुनाईं कै नायं?

—ऐसी सुनाईं जो कहीं नहीं सुनाता। पर उनकी ज़्यादा सुनीं। चार घंटे ऐसे बीते कि मैं शोक से सचमुच अशोक हो गया। बैंगलोर का एक गोविन्द था। उसने अपनी टूटी-फूटी हिन्दी में अपने तीसरे प्रेम की पहली कविता सुनाई। वह अपने उच्चारण दोष के कारण खाली लडकी को काली लडकी बोल रहा था। प्रेम के नए-नए स्फुरणों की कविताएं थीं। युवा जब हंसते हैं तो बुक्का फाड़ कर हंसते हैं। बुक्का मुझे नहीं मालूम क्या होता है। बहरहाल, ज़रा से विरह-वियोग की बात छू जाए तो मिलकर रोने लगते थे। हैरानी की बात थी कि जब दीपाली ने शोर कविता सुनाई तो सबमें एक सन्नाटा व्याप्त हो गया। आविका ने ‘संडे’ सुनाई तो फिर से हंसी लौट आई। अनूपऔर आदित्य ने आज की सामाजिक समस्याओं पर गहरे कटाक्ष किए। सौम्या की कविता ने कइयों को रुला दिया। सिद्धांत मागो की ’गुदगुदी’ ग़ज़ब थी। मैं मगन-भाव से सुनता रहा और देखता रहा कि बीस से तीस के बीच का यह युवा वर्ग अनुभवों से कितना संचित है और हिंदी की साहित्यिक परंपराओं से कितना वंचित है। इनको छंदोबद्ध कविता के व्याकरण का बोध लगभग नहीं था। इनको साहित्य का गहरा ज्ञान भी नहीं था। जो था, वह था उनका तात्कालिक अनुभव, दोस्तियां, प्रेम के प्रस्ताव, नई दुनिया बसाने के सपने और उन सपनों में आड़े आने वाले निराशा के घने बादल। फिर बादलों को चीरती हुई कोई बिजली की कौंध और फिर से ठहाकों का अजस्र प्रवाह।

—’पच’ नाम चौं रख्यौ ऐ?

—’पच’। पी ए सी एच! पोएट्री एंड चीप ह्यूमर का लघु रूप। चीप ह्यूमर तो मैंने उनकी कविताओं में नहीं पाया, हां, एक खुलापन था संबंधों, अभिव्यक्तियों का,तानों-तिश्नों के साथ। किसी-किसी कविता में चिरकिन सम्प्रदाय की भी झलक थी। पर इतना बताऊंगा कि पिछले एक महीने के लगभग हर तीसरे-चौथे दिन होने वाले इस मृत्यु के तांडव के बाद मुझे गुदगुदी और ठहाकों ने भविष्य के प्रति आशावान बनाया। शायद मौत अब हिंदी लेखकों पर न मंडराए। बाल्मीकि जी कोश्रद्धांजलि!

 


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