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    20110510 Ghar banta hai ghar walo seदरवाज़ों से ना दीवालों से,

    घर बनता है घर वालों से!

     

    अच्छा कोई मकां बनाएगा

    पैसा भी ख़ूब लगाएगा

    पर रहने को नहिं आएगा

    तो घर उसका भर जाएगा

    सारा मकड़ी के जालों से।

     

    दरवाज़ों से ना दीवालों से,

    घर बनता है घर वालों से!

     

    घर में जब कोई न होता है

    दादी है और न पोता है

    घर अपने नैन भिगोता है

    भीतर-ही-भीतर रोता है

    घर हंसता बाल-गुपालों से।

     

    दरवाज़ों से ना दीवालों से,

    घर बनता है घर वालों से!

     

    तुम रहे भी मगर लड़ाई हो

    भाई का दुश्मन भाई हो

    ननदी से तनी भौजाई हो

    ऐसे में तो राम दुहाई हो

    घर घिरा रहेगा सवालों से।

     

    दरवाज़ों से ना दीवालों से,

    घर बनता है घर वालों से!

     

    गर प्रेम का ईंट और गारा हो

    हर नींव में भाईचारा हो

    कंधों का छतों को सहारा हो

    दिल खिडक़ी में उजियारा हो

    घर गिरे नहीं भूचालों से।

     

    दरवाज़ों से ना दीवालों से,

    घर बनता है घर वालों से!

    wonderful comments!

    1. anurag singh मई 29, 2011 at 10:57 पूर्वाह्न

      chakradhar ji shabdateet baten hain aapki is rachna me

      1. ashokchakradhar मई 30, 2011 at 7:21 पूर्वाह्न

        धन्यवाद अनुराग

    2. madan mohan jain मई 30, 2011 at 3:43 पूर्वाह्न

      kitna sahi kaha hey apney.

      1. ashokchakradhar मई 30, 2011 at 7:22 पूर्वाह्न

        सही क्या है, ये तो सबको मालूम होता है, बस अमल नहीं कर पाते हैं।

    3. Shobhana Welfare Society Regd. मई 30, 2011 at 6:52 पूर्वाह्न

      बहुत खूब..

      1. ashokchakradhar मई 30, 2011 at 7:23 पूर्वाह्न

        धन्यवाद

    4. priti shukla मई 30, 2011 at 7:25 पूर्वाह्न

      Bete ko ilm nahi hota ma jagi kitni raton ko ab baat agar kuchh kahti hai bete ko jaise chubhti hai samwad na kitne saalon se. ghar banta hai gharwalon se. - dhrishtta ke liye kshama keejiyega.

      1. ashokchakradhar जून 27, 2011 at 7:04 पूर्वाह्न

        प्रीति जी आपने अप्रीतिकर सचाई बताई है। कविताई विडंबनाओं को भी सामने लाती है। आपने अच्छी पंक्तियां बनाईं।

    5. bhavesh bhatt जून 1, 2011 at 8:07 पूर्वाह्न

      Ham ne to nek iraade se giraaya ghar ko, aandhiyo ke liye thodi si jagah ho jaaye. -bhavesh bhatt

      1. ashokchakradhar जून 6, 2011 at 2:20 अपराह्न

        भावेश जी! मेरे पिता ने लिखा था-- फिर उठें तूफान हर रुख से, मैं नहीं डरता किसी दुख से। और सुख की बात ही क्या है वह चला जाए बड़े सुख से।

    6. sneha mishra जून 1, 2011 at 5:37 अपराह्न

      true and lovely one sir!

      1. ashokchakradhar जून 6, 2011 at 2:30 अपराह्न

        धन्यवाद स्नेहा

    7. Milan जून 3, 2011 at 5:28 पूर्वाह्न

      wakai me kamal kar diya aapne, mai to aapka fan ho gaya pahli hi kavita me

      1. ashokchakradhar जून 6, 2011 at 2:31 अपराह्न

        मिलन और भी कविताएं मिलती रहेंगी।

    8. vinay shukla जून 8, 2011 at 3:55 अपराह्न

      aaj ke daur me badalte bhayichare ka mukammal bayaan hai yah kavita. dhanywaad

      1. ashokchakradhar जून 27, 2011 at 7:05 पूर्वाह्न

        धन्यवाद विनय

    9. sunita patidar जून 26, 2011 at 12:31 अपराह्न

      bhut sahi kaha aapne ki gher gherwalo se banta hai lekin gherwalo mye ekta na hui to vah sawalo se bher jayega .

      1. ashokchakradhar जून 27, 2011 at 7:07 पूर्वाह्न

        हाँ सुनीता, सवालों से भर जाता है घर, अगर एकता घर की कपूर हो जाए।

    10. Narayan singh Adhikari मई 18, 2012 at 4:17 पूर्वाह्न

      bahut hi maarmik kavita chakradhar jee. dil ko choo gai

    11. Jai Prakash Shaw मई 18, 2012 at 6:00 पूर्वाह्न

      sachchi baat....nice composition...

    12. siddharth जून 9, 2012 at 2:17 पूर्वाह्न

      पैने पत्थर जोड़ कर, बने न घर दीवार, सीधी प्रेम की ईंट से, बनता घर परिवार. बर्तन चार साथ में, मैंने रखे जोए, बिन बाजे वो रह सके, ऐसा कभी न होए.

    13. JAGDISH KHATRI जून 3, 2016 at 11:48 पूर्वाह्न

      SIR, APKI EK KAVITA BAHUT SAMAY PEHLE DAINIK BHASKAR ME CHAPI THI.JISKE BOL KUCH IS TARAH THE -----APNE IS CHOTE SE DUKH KA TU KYON ROYE RONA RE ----TREA DUKH TO HAI EK RUI KA BORA RE.SIR, YE KAVITA MUJHE BAHUT PASAND HAI AUR APSE ANURODH HAI KI YE KAVITA MUJHE MERI email id [email protected] par mail karwake mujhe anugrahit karen.

    14. अशोक लाहोटी जून 19, 2016 at 1:15 पूर्वाह्न

      घर को परिभाषित करने के लिये ये पद्य सचमुच काबिले तारीफ है ।वाकई अगर समाज इसके मर्म को समझ सके तो कई झगडे न्यायालय के बजाय घर पर ही सुलझ जाये ।

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