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गीत से भी तो पूछ लो

गीत से भी तो पूछ लो

 

—चौं रे चम्पू! जे टू-जी का बला ऐ रे?

—टू-जी का मतलब तुम कुछ भी लगाओ, मेरे लिए है, गांधी और गुरुदेव। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर। मैं इनकी जितनी भी कविताएं पढ़ता हूं मुझे लगती ही नहीं हैं कि ये डेढ़ सौ पहले पैदा हुए इंसान की लिखी हुई कविताएं हैं। सौ साल पहले एक कविता लिखी थी गुरुदेव ने, जिसका शीर्षक था ’यथास्थान’। उसके पचास साल बाद एक कविता लिखी ‘गीतफरोश’, भवानी दादा ने।

—हां लल्ला, वो तौ सुनी ऐ मैंनै!

—‘हां हुजूर! मैं गीत बेचता हूं, तरह-तरह के गीत बेचता हूं।’ माल की तरह से वे ग्राहक को गीत दिखाते हैं, दाम बताते हैं। कुछ गीतों को मस्ती का लिखा बताते हैं, कुछ को पस्ती का लिखा बताते हैं। किस्म-किस्म के गीत हैं चचा। अलग-अलग डिजायन के गीत हैं। ‘गीतफरोश’ बनकर भवानी दादा बाजार में गीत को ले आते हैं और ग्राहक से कहते हैं कि भई वैसे गीत बेचना पाप है, लेकिन क्या करूं गीत बेचता हूं, लाचार हूं। ख़रीदना हो तो भीतर पूछकर आ जाओ। अब चचा आइए ’यथास्थान’ नाम की कविता पर, जो टैगोर ने लिखी। यहां मुद्दा ये है कि गीत से भी तो पूछ लो कि वह कहां बिकना चाहता है?

—अरे वाह!

—हां, यही तो असल बात है चचा कि रवीन्द्रनाथ अपने गीत से पूछ रहे हैं कि तू कहां बिकना चाहता है। वे कहते हैं कि तू कहां बिकेगा मेरे गान? विद्यारत्नों के मौहल्ले में? जहां पंडित लोग आकाशव्यापी चर्चाएं करते रहते हैं। बिना बात की बहसें होती हैं। तू क्या उन महापंडितों के बीच में, जहां मोह के अंधकार के विनाशक पोथी-पत्रे रहते हैं, एक किनारे में स्थान पाना चाहता है? गीत गुनगुनाकर कहता है कि नहीं, नहीं, नहीं मैं वहां नहीं रहूंगा।

—फिर?

—क्या तू वहां रहना चाहता है जहां अमीर लोग रहते हैं। पत्थरों के निर्मित प्रासाद में, भाग्यवान होते हैं, उनके ग्रंथालय में पांच हजार ग्रंथ हैं। सोने का पानी चढ़ा है उनकी किताबों पर। कोई उनके पृष्ठ नहीं खोलता। नौकर उनकी धूल झाड़ देते हैं बस। तू क्या वहां बिकना चाहता है! नहीं वहां नहीं, वहां नहीं बिकना चाहता। तो उधर देख, एक किशोर पढ़ाई कर रहा है। उसे सभी अपाठ्य पुस्तकें, पाठ्य पुस्तकें बनाकर दी जाती हैं। वह अपाठ्य सामग्री को पढ़ता रहता है और कविता को अपने माता-पिता से छिपाकर रखता है। वहां बिकना चाहता है क्या? गीत दुविधा में पड़ जाता है। उसका मन जाने-जाने को करता है, लेकिन उत्साह में नहीं आ पाता।

—फिर कहां बिकैगौ?

—जहां गृहलक्ष्मी मायके आ जाती है और तकिए के नीचे दबी पुस्तक निकालकर देखती है। यहां बच्चे पन्ने फाड़ देते हैं। पुस्तकों पर सिन्दूर लगा हुआ है, काजल लगा हुआ है। शैय्या के ऊपर बेतरतीब पड़ी हैं पुस्तक। बोल वहां बिकेगा क्या? लोभ तो आता है गीत को, लेकिन डर के मारे कांपने लगता है कि कहीं उसकी हालत चिन्दी-चिन्दी न हो जाए। बता फिर तू कहां जाएगा? वहां जहां युवक और युवती सुख से पागल होकर घूम रहे हैं और अंधेरे को खोज रहे हैं। पक्षी उन्हें गीत सुनाते हैं, नदियां उनको कहानियां सुनाती हैं। पुष्प, लता और पत्र कितने तरह के छन्द सुनाते हैं। जिनकी सरल हंसी और सजल नयनों से पूरा ब्रह्माण्ड बंसी की तरह निनादित होता है। अचानक गीत उछलकर कहता है कि हां, हां, हां, मैं वहां बिकना चाहता हूं। मैं वहां जाना चाहता हूं।

—जे भई न आज की कबता! आज कौ गीत!

—गीत कहां जाना चाहता है? जहां यौवन है, जहां उमंग है। भारत जैसा जवान देश आज दूसरा नहीं है। इस गीत का गीत जैसे भारत का युवा मन हो। जवान हृदय जीवन के उजाले के लिए अंधेरा ढूंढें तो ठीक लेकिन उजाले में अंधेरा ढूंढने लगेंगे तो गड़बड़ी होगी। गुरुदेव की कविता अंधेरे में भी ले जाती है तो उजाले के लिए।

 

 


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