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गीली लकड़ी सुलगे जैसे

geelee lakadee sulage jaise

 

 

 

 

 

 

 

गीली लकड़ी सुलगे जैसे

(एक विरहिणी का पीड़ा-गीत)

 

गीली लकड़ी सुलगे जैसे

ऐसे काया जलती है,

बांध की दीवारों के पीछे

धारा एक मचलती है।

 

जब दिख जाते चोंच मिलाते

डाली पर चकवी चकवा।

अंधड़ सी बनकर उड़ती है

अंदर पागल मस्त हवा।

 

भीतर भीतर धुंआ घुमड़ता

धुंआ घुमड़ता भीतर भीतर

दहके जैसे कोई अवा,

लाइलाज ये रोग बनाया

ना इलाज ना कोई दवा।

 

प्यास की मारी तपते रेत में

तपते रेत में प्यास की मारी

मछली एक उछलती है।

गीली लकड़ी सुलगे जैसे

ऐसे काया जलती है।

 

पंच तत्व की देह सुरीली

भाटा पत्थर क्यों न हुई

पीर बढ़ाती राग-रागणी

चुभती कोई मधुर सुई।

 

हिवड़े के अंदर रह रह कर

रह रह कर हिवड़े के अंदर

क्यों उठती है टीस मुई

मर कर भी क्यों जी उठती है

इच्छाओं की छुई-मुई।

 

सन्नाटे में अंधियारे के

अंधियारे के सन्नाटे में

गूंगी चीख़ निकलती है।

गीली लकड़ी सुलगे जैसे

ऐसे काया जलती है।

 


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