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फागू मेरे दिल का स्वर्ग

फागू मेरे दिल का स्वर्ग

 

—चौं रे चम्पू! पिछली बार तैनैं फागू कौ जिकर कियौ ओ, कहां और कैसी ऐ जे जगै?

—चचा ये जगह स्वर्ग जैसी है। पता नहीं कैसे मेरे नसीब में लिखी थी। दस साल तक गर्मियों की छुट्टियां बच्चों के साथ यहीं बिताता रहा। दरअसल, सन अठहत्तर से कविसम्मेलन धकाधक चल पड़े थे। तुम्हारे चम्पू का नाम किताबों और पत्रिकाओं से निकलकर जनता की ज़बान तक पहुंचने लगा था। प्रारंभ में रेडियो का और फिर टेलीविजन का ज़बरदस्त योगदान रहा। मेरे पिता की ख्याति और काका हाथरसी जी के यश का भी मुझे लाभ मिला। पिता से मुझे कविता मिली और काका से जीवन-शैली के अनेक आयाम।

—जीबन-सैली कौ का मतलब भयौ?

—बहुत सारे मानवीय गुण थे उनमें। हंसना-हंसाना उनका धर्म था। स्वास्थ्य की चिंता रखते थे। सुबह शाम नियमित रूप से टहलते थे। गर्मियों में कविसम्मेलनों में नहीं जाते थे। एक महीना गंगा किनारे बिताते थे और दो महीने पहाड़ों पर। सन उनासी और अस्सी की छुट्टियां मैंने सपरिवार उनके साथ बिताईं। लेकिन, कुछ किंतु-परंतु थे कि बाद में मैंने जाना बन्द कर दिया। काका जी के स्नेह में कहीं कोई कमी नहीं थी। अपनी ही आड़ी-तिरछी अहंकारपोषित आदतें  मसूरी के प्रति अनुत्साहित हो गईं। और फिर काका जी स्वयं किसी के मेहमान रहते थे। मेहमान का मेहमान कितने दिन रुके!

—तू तौ उनकौ वैसे ई मेहमान ऐ! जमाई राजा!

—अरे चचा, मेरे अंदर जमाई-भाव कभी जमा ई नईं। उन्होंने एक कविता लिखी थी ‘जम और जमाई’, हालांकि मेरे जमाई बनने से पहले लिखी थी, मज़ेदार है, ‘बड़ा भयंकर जीव है, इस जग में दामाद, सास-ससुर को चूस कर कर देता बरबाद।’ पूरी कविता जमाई-विरोधी थी, पर काका मेरे विरोधी कभी नहीं रहे। मेरी प्रगति से प्रसन्न होते थे और मेरा साथ उन्हें अच्छा लगता था। पर मेरठ वाले ताऊ जी से सुना हुआ एक दोहा मैंने काकाजी को सुना दिया, ‘दूर जमइया, सोणा जैसा, पास जमइया आधा। घर जमइया गधा बरोबर, जिन चाहा धर लादा।’ ख़ैर, तुम फागू के बारे में पूछ रहे थे।

—हां, फागू की बता!

—पिचासी या छियासी में शिमला में समर फेस्टिवल के सांस्कृतिक कार्यक्रमों की शृंखला में एक कविसम्मेलन हुआ। मैंने ही आयोजित कराया था। कार्यक्रम भव्य हुआ, जलवा सा कटा, धाक सी जमी। अधिकारियों में एक थे कश्यप जी। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि यदि मैं चाहूं तो एक-दो दिन और ठहर सकता हूं। आपकी बहूरानी और दोनों बच्चे साथ में थे। नेकी और पूछ-पूछ। पीडब्ल्यूडी के रेस्ट हाउस में हमारी बुकिंग करा दी गई। क्या आनन्द आया, वाह! गेस्टहाउस में संयोग से वरिष्ठ इंजीनियरों की एक मीटिंग थी। मैस में उनसे भेंट हुई तो वे परम प्रसन्न दिखे क्योंकि श्रोताओं में वे भी शरीक थे। कुछ दूरदर्शन के नाते जानते थे। एक बोले, अगले साल हमसे सम्पर्क करना। आपको बहुत अच्छी जगह पर टिकाएंगे। शिमला से पच्चीस किलोमीटर ऊपर एक जगह है। और उन्होंने अगले साल ठहराया फागू में। फागू का रेस्ट हाउस बाहर से बड़ा ही अनाकर्षक और ऊबड़-खाबड़ सा दिखता था। दरअसल, वह एक पुरानी गैंग-हट थी जिसके पिछवाड़े पीडब्ल्यूडी की निर्माण-सामग्री पड़ी रहती थी। लम्बे-लम्बे सरिए, सीमेंट के बोरे, तारकोल के ड्रम और उनके बीचोबीच रहते थे हम। वह अन्दर से सुविधासम्पन्न दो कमरों का एक घर था, जिसमें छोटी सी रसोई थी। थके-हारे इंजीनियर लोग आते थे। शामू नाम का रसोइया दूर एक झोंपड़ी से खाना बनाकर लाता था। हम वहां रुकने लगे। एक-एक महीना। उस शामू की खूब सेवाएं लीं हमने फागू में। लिखते-पढ़ते और आनन्द करते थे। उस एक महीने में दो-तीन दिन सामने के लॉन में पार्टियां होती थीं। इंजीनियर लोगों के अन्दर की कलात्मक प्रतिभाएं निकल-निकल कर आती थीं। हरवंश जी बहुत अच्छी कविताएं लिखते थे। सतीश सागर बहुत अच्छा गाते थे। भटनागर जी को सहगल की लहराती आवाज में गाने में बड़ा मज़ा आता था, उनकी पत्नी को खुलकर हंसने में। कुल मिलाकर एक ऐसा परिवार बन गया जो दस साल तक हर साल मिलता रहा। उस दौरान उनके और हमारे बच्चे बड़े होते रहे। उनकी मैत्रियां होती रहीं। मैत्रियां आज भी जिन्दाबाद हैं। फागू आज भी मन में बसा हुआ है। हिमाचल का नहीं मेरे दिल का स्वर्ग है।

 


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