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  • फागू में कुदरत के ख़ज़ाने

    20020620 Fagu 5कहने को तो काफ़ी सारी दुनिया घूमी है, लेकिन एक स्थान है जो मेरी स्मृतियों में निरंतर घूमता रहता है– फागू। शिमला से बाईस-तेईस किलोमीटर ऊपर की ओर। शिमला राजभवन से पौन घंटे का रास्ता। अगर टनल में न अटके। कहते हैं कि शिमला में भी अब गर्मी ज़्यादा रहने लगी है। ग्लोबल वॉर्मिंग की मार पहाड़ों पर भी पड़ी है। पिछले दिनों शिमला गया तो फागू की ललक मुझे वहां ले गई और मैंने पाया कि फागू किसी ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार नहीं हुआ है। जैसा था लगभग वैसा ही है। कुछ मकान और बन गए, कुछ नए फ़्लैक्सी होर्डिंग और लग गए, लेकिन क़ुदरत के करिश्मे यथावत हैं। अचानक फॉग आ जाएगी, कभी विरल, कभी सघन। एक तिकोने पहाड़ पर तेज़ रफ़्तार हवा इतनी घूमती-घामती चलेगी कि लगेगा जैसे आपका कुर्ता ही उतारने पर उतारू हो। धूप और चांदनी भी भरपूर।

    20020620 Fagu 4फागू से मुझे विशेष प्रेम है। उसकी वजह यह भी है कि दस साल तक हम दोनों अपने दोनों बच्चों के साथ निरंतर फागू आते रहे और तब तक आते रहे जब तक कि बच्चे जवान नहीं हो गए और उनकी दिशाएं, राहें और उड़ानें नहीं बदल गईं। महीने भर रुकते थे। पीडब्ल्यूडी की एक हट थी जो हठपूर्वक वरिष्ठ अभियंताओं ने अपने पास रख ली थी। नेताओं का ध्यान उस हट पर चला जाता तो उसे गेस्टहाउस बना दिया जाता, जिसके कमरे प्रियजनों को दिए जाते। तीन-चार दिन से अधिक कोई रह नहीं पाता। पीडब्ल्यूडी के अभियंताओं का यह निजी विश्रामस्थल था। मेरे प्रेमी थे वे लोग। हट के प्रांगण में महीने में दो-तीन दिन रसरंजन और भोजनानन्द के साथ कविताएं होती थीं। इसकी एवज में ये निर्मल हृदय के कला-प्रेमी इंजीनियर मुझे वहां टिके रहने की सुविधा देते थे। मेरे साथ उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियों को अवसर मिलता था। मैं भी हर बार अपनी एक-दो किताब बना लेता था और बच्चों के साथ किलोल करता था।

    20020620 Fagu 1क्या कहने हैं फागू के! हट नामक गेस्ट हाउस के कमरे से निकलकर अगर एक घंटे भी खड़े रहो तो कितने सारे मौसम बदल जाएंगे। थोड़ी देर ग्लोबल वार्मिंग का सा असर दिखेगा, लेकिन ज़रा सी देर में लोकल कोल्ड लगेगा, लोकल रेनी हो जाएगा, लोकल ओले-ओले हो जाएगा, ओले ही ओले। मैंने एक ग़ज़ल भी कह डाली वहां पर— ‘यहां फागू में कुदरत ने ख़ज़ाने किस क़दर ख़ोले, अभी गर्मी, अभी सर्दी, अभी बारिश, अभी ओले।’ फिर दिखाई देते थे चारों तरफ पहाड़, ठियोग जाने वाली चौड़ी सड़क पर एक मंदिर, तिराहे से चियोग को जाने वाली लहराती, बल खाती, देवदार वृक्षों से घिरी एक कमनीय सड़क। उस पर गुजरते वाहन, बिजली के तार, सीढ़ीदार खेत, गुलाबी दीवारों वाला पोस्ट ऑफिस। ये सब अगर मिलकर पुकारें तो उतरना पड़ेगा आपको। जाना पड़ेगा चियोग।

    20020620 Fagu 2और अचानक पहाड़ों से संवाद करने लगता हूं मैं। बादलों का, धुंध का, फॉग का क्या भरोसा? आए और गए! ध्यान तो तुम्हें रखना होगा पहाड़ो! ‘पहाड़ो तुम ज़रा इन बादलों पर भी नज़र रखना, न कोई बेहया पागल फिज़ाओं में ज़हर घोले।’

    देखिए, ये तो आनन्द लेने वालों की मर्ज़ी पर है कि वे अपनी छुट्टियां कहां और किस प्रकार बिताते हैं। मन चंगा और निर्मल विमला, तो कठौती में गंगा मसूरी शिमला। सचमुच शिमला जाइए, वहां ख़ूब सारे होटल या गेस्ट हाउस मिलेंगे। पहाड़ों को कांट-छांट तराश कर महानगरीय बोध देने के लिए सीमेंट से पोतने के बाद छोटे-छोटे स्थानों में ज़्यादा सुविधाएं परोस दी गई हैं, लेकिन आनन्द यहां नहीं हैं। थोड़ा ऊपर चले जाएं या नीचे उतर जाएं। पहाड़ी गांव और कस्बे देखें। वहां प्रकृति भी उनके साथ किलोल करती हुई मिलेगी। हालांकि, इंसान के हाथों ने यहां भी पहाड़ों से टक्कर लेकर अपनी झोंपड़ी, अपनी खपरैल-टीन की छतें बनाई है, लेकिन यह एक अनगढ़ सौन्दर्य है। पहाड़ से टूटे पत्थर के टुकड़ों को उनकी अनगढ़ता में जमा-जमा कर एकसार करने की कला आंखों से दिमाग़ तक जाती है और दिमाग़ से हाथों तक आती है। पतली सर्पिल पगडंडियां और उन पर स्कूल जाते हुए बच्चे, पहाड़ों की दूर तक दिखती श्रृंखलाएं, उसमें चरते मवेशी, दूर-दूर छितरी हुई टीन की छतें, सीढ़ीदार खेत, रंग बदलता मौसम। टहलते-टहलते बारिश आ जाए और आप छाता लेकर नहीं निकले तो समझिए एक ठिठुरन-कंपकपी बहुत देर तक आपका साथ निभाएगी। बढ़िया जूते हों, एक शॉल, एक छाता, साथ में बागेश्री जी तो बाहर निकलने में बड़ा मज़ा आता है। पतली सड़क से ऊपर की ओर देखो तो पहाड़ों पर चलते हुए नवनिर्माण दिखाई देंगे। नीचे की ओर देखो तो टीन की छत। मैंने एक छोटी सी कविता चियोग की पतली सड़क की एक पुलिया के सीमेंट जैसे बने बैंच पर बैठकर लिखी थी— ‘टीन की छत’। कविता में ग्लोबल गांव में मनुष्यता के विस्तार का एक दृश्य था—

    20020620 Fagu 3‘सामने टीन की एक छत, उसके आगे एक नीचा पर्वत। उसके आगे थोड़ा बड़ा पहाड़, उसके आगे थोड़ा और बड़ा पहाड़। चलो देखते हैं क्या है उस बड़े पहाड़ के आगे? एक पैर रखा टीन की छत पर दूसरा नीचे पर्वत पर, अब एक छलांग लगाते हैं बड़े पहाड़ पर, एक छलांग और, और बड़े पहाड़ पर। अब देखते क्या हो बेहूदो? नीचे कूदो! रुको! रुको! रुको मेरे यार! ये तो पता चल ही गया कि क्या है पर्वतों के उस पार। धत! वही टीन की एक छत।’

    पहाड़ के इस तरफ, पहाड़ के उस तरफ मनुष्य बसते हैं। और दोस्तो! छुट्टियां बिताने के हज़ारों रस्ते हैं। जहां भी मन आए, वहां जाएं। एक टीन की छत के नीचे किसी मनुष्य की मुस्कान की नज़रों से अपनी मुस्कान की नज़रें मिलाते हुए। अच्छा जूता, अच्छा शॉल और अच्छा छाता और जीवनसाथी को साथ लेकर निकलेंगे तो छुट्टियां अच्छी बीतेंगी। जवान बच्चे पुन: बच्चा बनने को राजी हो जाएं तो कहने ही क्या!

     

    wonderful comments!

    1. dr.vishnu saxena जून 8, 2011 at 5:26 पूर्वाह्न

      bahut sundar lekh hai daddu, foto bhi gazab ke.......

      1. ashokchakradhar जून 11, 2011 at 1:51 अपराह्न

        विष्णु डियर, मुद्दतें हो गईं मिले हुए।

    2. Shobhana Welfare Society Regd. जून 10, 2011 at 12:01 अपराह्न

      nice post chakradhar ji..

      1. ashokchakradhar जून 11, 2011 at 1:51 अपराह्न

        धन्यवाद

    3. sunita patidar जून 28, 2011 at 5:27 अपराह्न

      fag ka varnan bhut hi acha laga . yesa laga mano fag hee pahuch gye ho .

    4. Manish Dikshit जुलाई 12, 2011 at 10:24 पूर्वाह्न

      फागू घूम लिया,पूरा…अति सुन्दर मिश्रित व्रित-चित्र।

    5. nikhil जुलाई 29, 2011 at 6:41 पूर्वाह्न

      जीवन में इक बार जिए हम ,फिर से सब कुछ हार निश्छल पल वो फिर से आये ,लौटा वो अल्हड़ प्यार गीतों का बुहार जिया फिर से ,गाये हमने मल्हार आकर moov भले माली हो लेकिन ,मज़ा आ गया यार . sach me sr bahut achchhey chitr aur chitron m aap v aapka ye lekh sach m maza aa gaya

    6. manoj pathak अगस्त 4, 2011 at 5:30 अपराह्न

      ati sunder

    7. meenakshi yadav अगस्त 23, 2012 at 6:30 अपराह्न

      aap lajawab hain,sir.

    8. Anoop जनवरी 8, 2013 at 4:05 अपराह्न

      Sir! Aaj ke samay main agar purani duniyan ki yadein dekhna chahta hoon to jahan main aapka bhi naam aata hai...bahut saal pahle chote main apne ghar main parents ke saath aapki kavitayan sunta tha...wah kya jamana tha :) aaj bhi kabhi kabhi dhoonda hoon ki aap tv par kahin mil jayein...kuch samay ke liyeh wo jamana wapas aa jayeh !! I like your hindi kavitayen a lot !! Kabhi kavee sammelan ho Hyd main to bataiyega. Aajkal ki movies se hatkal agar mujhe shanti chaiyeh to aapki hindi kavitayon se behatar aur kya ho sakta hai...salute you for encouraging hindi in this changing world. Anoop (Hyderabad but born in Jhansi)

    9. शारदा सुमन मार्च 16, 2013 at 10:49 पूर्वाह्न

      यहां फागू में कुदरत ने ख़ज़ाने किस क़दर ख़ोले, अभी गर्मी, अभी सर्दी, अभी बारिश, अभी ओले।’ फागू आपने तो पूरा हीं दिखा दिया शब्दों द्वारा. लेकिन अब पहली सैर फागू की ही होगी...

    10. dilip shakya दिसम्बर 3, 2013 at 8:11 अपराह्न

      pdhkar maza aa gaya..inspiring..kisi din zaroor niklenge faagu ki sair ko..

    11. Ramji Dwivedi जून 20, 2014 at 2:54 अपराह्न

      बड़ी मुददतो के बाद मिलते हैं कुदरत के ऐसे झरोखे....कुछ तुमने देखे कुछ मैंने देखे|

    12. i s gupta अगस्त 6, 2014 at 4:51 अपराह्न

      ashok chakradhar ji kee kavitaon ka kya kehna. mene to inkiee dher saari kavitayen yaad kee huyin hai. aur inke madhyam se mahfil loot leta hoo.

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