अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > एक मुद्दे की आरी से सारे गुद्दे न काटो

एक मुद्दे की आरी से सारे गुद्दे न काटो

चौं रे चम्पू

एक मुद्दे की आरी से सारे गुद्दे न काटो

 

—चौं रे चम्पू! हाथ में जे पोटला कैसौ ऐ तेरे पास?

—चचा, टीशर्ट और टोपियां हैं। फोकट में बंट रहीं थीं। इन पर लिखा हुआ है, भ्रष्टाचार मिटाओ।

—भ्रस्टाचार के तौ हमऊ पक्के बिरोधी ऐं पर जे कौन से भ्रस्टाचार के तहत बंटीं?

—छोड़ो चचा! इनको काला रंगवा लो और अपनी बगीची के सारे पहलवानों को पहनाओ। काला रंगवाओ, ताकि यह पता न चले कि ये अन्ना की मुहिम की हैं कि अधन्ना की मुहिम की। हम तो अधन्ना वाले हैं| लेकिन कम्बख़्त टोपी-शर्ट बांटकों ने यहां भी भ्रष्टाचार दिखाया। ये ध्यान नहीं रखा कि जाड़े आ गए हैं। पूरी बांह की कमीज बंटवाते तो कुछ निजात भी मिलती। थोक में बंट रही थीं। एक बांटनहार मुझे पहचान गया। बोला, जी, आप तो भ्रष्टाचार के सनातन विरोधी हैं। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ कविताएं लिखते हैं। आपकी भ्रष्टाचार विरोधी कविताओं के आधार पर देशभर में नाटकऔर नुक्कड़ नाटक हुए हैं। लीजिए इन कमीज़ों को बंटवाइए। मेरे मन में आया कि कह दूं कि मैं हर प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोधी हूं। अनशन के इमोशनल अत्याचार के पीछे

राजनीतिक दलों का कदाचार साफ़ दिखाई दे रहा है। पर कहा नहीं, क्योंकि अपना देश इमोशन से ही मोशन में आताहै। कुछ कह दिया तो कुछ का कुछ समझा जाएगा। मैं बांटक की खोपड़ी की बुद्धि का फाटक नहीं खोल सकता था। इसलिए कहा, ठीक है भैया! बंटवा देंगे। और फिर इनके इस्तेमाल के लिए बगीची से अच्छी कौन सी जगह होती।

—हां, सारी सर्टन्नै रंगवाय कै बंटवाय दिंगे।

—चचा, पिछले दिनों एक अख़बार में एक कार्टून देखा था। जिसका भाव यह था कि संसद के सत्रों के समानांतर अन्ना की अनशन के भी सत्र होते हैं। अनशन समर सत्र, मॉनसून सत्र के बाद अब अनशन का विंटर सत्र होने वाला है। मुझे अन्ना के आन्दोलन का एक ही बड़ा और सकारात्मक पहलूदिखाई देता है कि वे इस देश के ग़रीबों को अनशनकला में

निष्णात कर रहे हैं। बस ग़रीब को इनकी तरह से धमकी देना नहीं आया। कह रहे हैं कि मर गया तो कॉंग्रेस ज़िम्मेदार होगी। देश में

कितने किसान आत्महत्याएं करते हैं, बेरोजगारी से तंग आकर कितने नौजवान निराशा के फंदे में झूलजाते हैं,

महाराष्ट्र में उत्तरभारतीय अकारण पिटते हैं, उनकी ज़िम्मेदारी किस समाज-व्यवस्था पर थोपेंगे!

टीम के बचेखुचों को लग गया होगा कि अब विंटर सैशन में शायद पहले जितनी भीड़ न जुटा पाएं

इसलिए कार और मोटरसाइकिल की रैली

ही निकाली। हज़ार कार और मोटरसाइकिलसवार। ये कौन से ग़रीबों की रैली थी! मैं ये नहीं कहूंगा कि रैली में भाग लेने वाले सारे चालकों की भावना मैली थी, पर इतना तो साफ-साफ देख सकता हूं कि आयोजनकर्ताओं की मोटी थैली थी। इधर अपना संसद का सत्र चल नहीं पा रहा है। आज उम्मीद है कि गतिरोध टूटे। एक करोड़ सत्तावन लाख रुपए रोज़ का चूना सिर्फ लोकसभा के प्रशासनिक खर्चों का आ रहा था। संसद न चलने से बाकी टोटल लगाओ तो लगभग आठ-दस करोड़ रुपए का नुकसान रोज़ाना हो रहा है। खोटे ज़ेहन और खोटे मुखौटे ही ज़्यादा दिखाई दिए। बढ़ते हुए अपराधों के इस देश में एक अपराध संसद का न चलना भी बढ़ता जा रहा है। इसे अपराध नहीं मानेंगे क्या?

—हां लल्ला, जरूर अपराध ऐ जे।

—अरे, संवाद के लिए संसद बनी है। रूठा-राठी, टूटा-टाटी के लिए थोड़े ही बनी है। तुम्हारी मतपेटियों में वोट की टोंटी खुली तो भारतमाता के बेटे-बेटियों की भी फिक्र करो। इकत्तीस बिल पेंडिंग पड़े हैं, तेईस बिल प्रस्तावना के लिए कतारबद्ध हैं

और कितने ही महत्वपूर्ण आर्थिक बिल ठण्डे बस्तेमें लग गए एफडीआई की तरह। तुम्हें संसद में इसलिए भेजा था कि सौमनस्य का माहौल बनाते हुए समस्याएं सुलझाओगे। पर वहां तो किसी एक समस्या को कांटा बना कर, सारी सुइयां अटका दी जाती हैं। घड़ी-घड़ी के नखरे दिखाकर घड़ी रोक दी जाती है। सांसदो! एक ही मुद्दे की आरी से पेड़ के सारे गुद्दे न काटो। संसद का वटवृक्ष पूरे देश को छाया देता रहे। हां, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ काली टीशर्ट पहनकर विरोध करने से हमें कोई नहीं रोक सकता।


 


Comments

comments

1 Comment

  1. Avanish Parihar |

    अशोक चक्रधर जी, आपकी दृष्टि जीतनी पैनी है, काश आम आदमी की समझ भी इतनी ही पैनी हो जाती तो इन सांसदों को सदबुद्धि आ जाती ……… आपका स्नेहभाजन अवनीश परिहार .

Leave a Reply