एक और सुन लो

एक और सुन लो    

—चौं रे चम्पू! तेरे पायं कौ चक्कर थमौ कै नायं?

—घूमता-फिरता बुरा लगता हूं क्या? मैं बगीची के मलखम्भ से बंधा रहने वाला नहीं हूं। जगह-जगह के लोगों से मिलता रहता हूं। दशहरा से एक दिन पहले बराड़ाअम्बाला के सबसे हाई रावण से इस साल फिर मिल कर आया। इस बार उसकी मूछें ज़्यादा शानदार थीं। पता नहीं वहां  बारिश आई या नहीं पर दिल्ली में जितने भीछोटे-बड़े, लो-हाई रावण थे, विजयादशमी से पहले ही गल गए। अब उनमें कौन दुबारा पिपरपन्नी और पटाखे बांधता। बहरहाल एक नई चीज़ हुई।

—सो बता, का नई चीज भई?

—मैंने पहली बार हाइकू रचे। रावण बाहर बहुत बड़ा और हाई पर अंदर बहुत छोटा होता है। हाइकू बाहर बहुत छोटा पर अंदर बहुत बड़ा होता है।

—का चीज ऐ जे हाइकू?

—कुल मिला कर सत्रह वर्णों का, तीन पंक्तियों में विभक्त एक छोटा सा जापानी छंद है। आप तो जानते हैं कि जापान सूक्ष्म के निर्माण में अग्रणी है। आपने एकलतीफ़ा सुना है?

—हाइकू की बात कर, लतीफा छोड़!

—नहीं! पहले लतीफ़ा सुनो! बंद मुट्ठी दिखा कर जापानी ने पूछा, बताओ इसमें क्या है? उत्तर मिला, टीवी। जापानी ने फिर से पूछा, बताओ कितने?

—मैं हंसूं का? हाइकू की बता!

—दशहरे से दो दिन पहले घर में एक पत्रिका आई ‘अभिनव इमरोज’। संपादक देवेन्द्र। अतिथि संपादक डॉ. मिथिलेश दीक्षित। वर्ष दो अंक चौदह। हाइकू विशेषांक।जिस समय उसके पन्ने पलट रहा था, तेज़ बरसात हो रही थी। मेरे मन में गहन चिंता थी कि बराड़ा का संसार का सबसे बड़ा रावण तो अब गल-गला जाएगा। ख़ैर, पढ़नेलगा हाइकू। मिथिलेश जी ने परिचय में लिखा था कि हाइकू गहन और तीव्र अनुभूतियों की सहज अभिव्यक्ति है। अंतर्कथ्य के ध्यान संकेन्द्रण से पूर्ण, यह संसार का सूक्ष्मतम छंद है। मैंने बारीकी से मुआइना किया। आदित्य प्रताप सिंह का एक हाइकू था, ’घर से बड़ा / प्रतीक्षा का दरवाज़ा / सितारों तक’। इसे देखकरलगता है कि पहली पंक्ति में पांच वर्ण होते हैं, दूसरी में आठ वर्ण और तीसरी में पांच वर्ण। तो पांच, आठ, पांच के क्रम में हाइकूलिखे जाते हैं। हिन्दी में भीहाइकूलिखने का चलन चल पड़ा है। पत्रिका में कई सारे हाइकू पढ़े, इधर दिमाग में हाई रावण का बिम्ब चल ही रहा था। उसके भीगने की कल्पनाएँ थीं। कुछ हाइकूलिख मारे। पांच, आठ, पांच के क्रम में।

—बता एक आध।

—पहला हाइकू,  “जल न सका / रावण वर्षा के बाद / गला बिचारा”। दूसरा हाइकू, “दिख गईं रे / रावण की अस्थियां / खपच्चियां”।

—अच्छा! भड़िया ऐं भैया!! औरू लिक्खे का?

—तीसरा सुनो, “राम बोले थे / मारूंगा रावण को मैं / गला गला के”। चौथा, “दम्भी रावण / दहन से पहले ही / लो गिर गया”। हाइकू का सिलसिला काफी चला। मेराराम-रावण से जुड़े चरित्रों से दिमाग हटा ही नहीं। फिर एक कल्पना आई अगले हाइकू में, “जलेगा नहीं / खुश सी हो गई सती / मंदोदरी”।

—हां, चौं खुस नायं होएगी भैया! कौन औरत जलनौ चाहै!

—ये प्रथा तो चचा राजस्थान की है। सामंती वातावरण ने औरत को जलने के लिए बाध्य कर दिया। सती प्रथा पहले नहीं थी। ये तो बाद में हमने पुराण कथाओं मेंक्षेपक प्रसंग डालकर हर देवी को सती के रूप में देखना शुरू कर दिया। अगला हाइकू सुनो, “जटायू के भी / रामलीला में पंख पांव / कीचड़ सने”। एक और हाइकू लिख मारा,  “मौसम भी है / दशानन, फिर गया / कोई सा सिर”। अब दस सिरों में कोई एक सिर फिर जाए तो मौसम करवट बदलेगा कि नहीं बदलेगा? अगला हाइकू सुनो, “बही लंका / पूंछ भी तो बुझ गई / हनुमान की”।

—अरे लल्ला, ऐसी बात मत लिख्यौ कर। हनुमान की पूंछ नायं जरि सकै।

—हां, लेकिन चचा, इस देश में जो आग है, जहां लगनी चाहिए, वहां लगती नहीं है और अगर लग जाती है तो बहुत जल्दी बुझ भी जाती है। चलो एक आख़िरी सुन लो,“चुनाव आया / फिर खड़े हो जाएंगे / सभी रावण।

—हां, जे बात तौ भौत सई कही पट्ठे!! तेरे हाइकू जोरदार ऐं। पर एक बात बताऊं, पांच आठ पांच नायं होयें, पांच सात पांच होयौ करें। सारे हाइकू ठीक कल्लै!

 


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