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  • दुम पे हथौड़ा

    —चौं रे चम्पू! हैलो! अवाज आय रई ऐ मेरी?

    —चकाचक आ रही है। यहां कल रात नींद नहीं आई चचा! जगती आंखों से सपने देख रहा था। झपकी लगती थी तो वही जाग्रत चिंताएं गतांक से आगे हो जाती थीं। वे चिंताएं सपने में निदान भी बता रही थीं।

    —का फिकर सताय रई ऐ तोय?

    —ऑस्ट्रेलिया में भारत से आए हुए बहुत सारे युवा कार्मिक हैं, जो जानना चाहते हैं कि बच्चों को हिंदी कैसे और कहां सिखाएं। यहां भारतवासियों के अनेक रेडियो स्टेशन हैं। परसों दर्पण रेडियो पर राम दुबे से बातचीत के दौरान साथियों के प्रश्न इसी विषय पर थे। कल यहां के एसबीएस रेडियो पर वरिष्ठ उद्घोषिका कुमुद मीरानी ने साक्षात्कार के साथ श्रोताओं के फोन-इन लिए, उनमें भी यही बात उभर कर आई। अब बताइए मैं क्या ठोस उत्तर देता? पैंतीस साल पहले एनसीईआरटी की प्रवेशिका निर्माण कार्यशालाओं में जाया करता था। अपने देश के बच्चों और नवसाक्षरों की आवश्यकताओं को में ध्यान में रखकर कितनी ही प्राइमर बनाईं, पर यहां की आवश्यकताएं भिन्न हैं। यही सपने देखता रहा कि यहां कैसे सहायक सामग्री बनाई जाए। सपने में मेरे साथ पूरी टीम सक्रिय थी। ओपेरा हाउस के विराट फ़लकों पर वर्णमाला के अक्षर संगीत के साथ थिरक रहे थे और बच्चे मेरे गीतात्मक पाठों को गा रहे थे। कुछ कम्प्यूटरी किताबें थीं जो सही उच्चारण के साथ वाक्य दोहराती थीं। बच्चों से बातें करती थीं। चित्रा मुद्गल, क्षमा शर्मा, राही, गुलज़ार, जावेद अख़्तर, दिविक रमेश, सब थे कार्यशाला में। अशोक वाजपेयी को एक ऊंचे टीले पर बिठा दिया, इस हिदायत के साथ कि बच्चों के लिए कुछ आसान लिखें। दिनकर, बच्चन और अज्ञेय बच्चों को डिक्टेशन दे रहे थे। बच्चों की उंगलियां विद्युत गति से देवनागरी की-बोर्ड पर टाइप कर रही थीं। एक छोटी बच्ची गुलज़ार साहब से पूछ रही थी कि घोड़े की दुम पे हथौड़ा क्यों मारा, उसे दर्द होगा। वे समझाने लगे कि घोड़े की दुम तो लकड़ी की थी, जैसे मेरे तम्बाकू की पाइप! मैंने पाइप की दुम पे हथौड़ा मारा, पाइप भाग गई! अचानक आ गए नई शिक्षानीति दो हज़ार सोलह के मसौदाकार। उन्होंने शिक्षा के रथ में जुती हिंदी की घोड़ी की दुम पे ऐसा हथौड़ा मारा कि हिंदी भाग गई।

    —तुमन्नैं मिलि कै घोड़ी पकड़ी कै नायं?

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