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  • चौं रे चम्पू
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  • दूसरा विश्वयुद्ध रंगीन
  • —चौं रे चम्पू! का करि रह्यौ ऐ आस्ट्रेलिया में?
    —चचा, सुबह-सुबह ठण्ड में पार्क की धूप का, दोपहर की आईने-आवारगी में अपने रूप का और शाम को बारिश की बूंदों के सूप का मज़ा ले रहा हूं। बीच-बीच में हो गई तो लिखाई-पढ़ाई, लेकिन रात में टी.वी. पर पुराने वृत्तचित्र पक्के। नैटफ्लिक्स पर एक धारावाहिक है ‘वर्ल्ड वार टू इन कलर’। शीर्षक देखकर मन हुआ कि देखा जाए और उसमें ऐसा अटका कि चार ऐपिसोड पुराने और पन्द्रह नए, सब देख मारे। लगभग बीस घंटे का मसाला। कुछ झपकियों के साथ देखे। दारुण दृश्य आते थे तो नींद एक घंटे के लिए भाग जाती थी।
    —का खासियत है भैया वामै?
    —इसमें दूसरे महायुद्ध की रियल फुटेज को इकट्ठा करके इतिहास की पुनर्रचना करने की रंगीन-संगीन कोशिश की गई है। सन उन्तालीस से पैंतालीस तक के छः साल के इस काल-खण्ड में बिखरे हुए संगीन दृश्यों को समेटकर उन्हें रंगीन कर दिया है और इस तरह बीसवीं सदी के बारे में फिर से सोचने की सामग्री दी है। इस विश्व-युद्ध के कारण-कार्य संबंधों को अब तक अमरीका या सोवियत संघ की नज़रों से देखा गया, क्योंकि युद्ध के बाद यही दो शक्तियां महाशक्तियां बनकर उभरीं थीं। इन्हीं के नक्शे-कदम पर पूरी दुनिया चल पड़ी थी। शीतयुद्ध हुआ तो बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध बदल गया और अब इक्कीसवीं सदी ने समझ लिया कि सर्वाधिक जन-धन की क्षति वाले ऐसे महायुद्ध को अब न्यौता नहीं देना है। चचा, विश्वयुद्ध की सभी चर्चित विभूतियों को सचमुच में देखना एक अनोखा अनुभव था। स्टालिन, च्यांग-काई-शेक, हिरोहितो, हिटलर, चर्चिल, रूज़वेल्ट और मुसोलिनी की सच्ची तस्वीरें! जाने कहां-कहां से इकट्ठी की हैं इन्होंने। सैकिण्ड वर्ल्ड वार पर कितनी ही फ़िल्में बनीं और अभिनेताओं ने इन चरित्रों को जीवंत किया। हर फ़िल्म का अपना नज़रिया था, लेकिन ये वृत्तचित्र-शृंखला ऐसी बनाई है कि आपको नज़रियाविहीन और सूचना-प्रधान ज़्यादा लगे। इस धारावाहिक में गांधी की अहिंसा का अस्त्र नहीं दिखाया गया। हिंसा ही हिंसा है। सैनिकों की कतार, नागरिकों का हाहाकार, हवाई हमले, युद्ध पोतों का डूबना, टैंकों का चलना, इमारतों का गिरना और लाशों के अम्बार। रात में देखता हूं और दिवास्वप्नों में युद्ध के दृश्य घूमते-मंडराते रहते हैं। फिर जब यहां की धूप में निकलता हूं, पार्कों में बच्चों को खेलते देखता हूं तो वे दृश्य गायब हो जाते हैं और मैं इतिहास से सबक लेकर आगे बढ़ते बच्चों को देखकर खुश हो जाता हूं। भला हो इंटरनेट का जिसने पूरी दुनिया को सच देखने का मौक़ा दिया। तीसरा विश्वयुद्ध अब नहीं होगा चचा। पहले-दूसरे में हम सुरक्षित रहे। अगर किन्हीं मूर्खताओं से तीसरा होता है तो सारी दुनिया तहस-नहस हो जाएगी, लेकिन चचा आपको यह जानकर हर्ष होगा, कि जो बचा रहेगा उसका नाम भारतवर्ष होगा।
    —तीसरौ होयगौ ई नायं!

    wonderful comments!

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