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दिमाग़ में फैलता रायता

दिमाग़ में फैलता रायता

 

—चौं रे चम्पू! का सोच रह्यौ ऐ रे?

—पता ही नहीं है क्या सोच रहा हूं! कुछ सोचता हूं, दिमाग़ कहीं और चला जाता है। चित्त स्थिर नहीं है चचा। दिमाग की हार्ड-ड्राइव करप्ट हो गई सी लगती है। जैसे एक नहीं अनेक वायरस लग गए हों। सॉफ़्टवेयर हार्ड सुलूक कर रहे हैं,हार्डवेयर सॉफ़्ट से लग रहे हैं, मेरे साथ टिकते नहीं हैं। संकल्प और विकल्पों में दिमाग चकरघिन्नी खा रहा है। भागता मैं दम छोड़, घूम गया कई मोड़! मुक्तिबोध रह-रह कर याद आते रहते हैं, क्या करूं, क्या नहीं करूं बताओ… आकाश मेंतैरती है जगत-समीक्षा की हुई उसकी.. सह नहीं सकता.. विवेक-विक्षोभ दिया हुआ उसका, उसके बिना रह नहीं सकता… । क्या करूं, कहां जाऊं, कौन सी रस्सी के पुल पर अकेला ही जाऊं और पार करूं पर्वत-संधि के गह्वर। आख़िरी फ़िल्मसन दो हज़ार में बनाई थी, ‘बिटिया’। मन करने लगता है कि कितनी ही तरह के काम कर लिए, अब सब कुछ छोड़छाड़ कर फिर से फिल्म बनाऊं। ख़ुद न भी बनाऊं पर निर्माण-प्रक्रिया का हिस्सा बनूं। ‘बिटिया’ फिल्म ध्यान में आई तोबंचारी दिमाग में घूमने लगी।

—गांव बंचारी! होडल के पास वारौ।

—हां चचा। वही गांव! फ़िल्म का विषय था बाल-विवाह। पूरी फिल्म एक चौपाल पर दो गायक मंडलियों के बीच होने वाली सांगीतिक नौंक-झौंक पर टिकी थी। बड़े मन से मैंने कहानी बनाई, गीत लिखे, अन्नू कपूर, रघुवीर यादव से काम लिया।मैं ही निर्देशक था और मैं ही लगभग निर्माता। बन गई, टीवी पर चल गई। आज अगर फिल्म बनाऊंगा तो चौपाल प्रसंग पर बना सकता हूं।

—सो कैसै?

—चचा! शूटिंग की सारी तैयारी हो चुकी थी। गांव के बीचोंबीच बड़ी चौपाल पर सेट लग चुका था, लगभग तीस गायकों का रिहर्सल चल रहा था। तभी हमारी किशोरी हीरोइन चौपाल पर चढ़ी कि हंगामा हो गया। कितने ही चौधरी वहां आ धमके।कोई छोरी, कोई औरत, इस चौपाल पर नहीं चढ़ सकती। हमारी परम्परा है। कहीं और जाकर बनाओ फ़िल्म। अरे, किसी ने पहले क्यों नहीं बताया, कहीं और सेट लगा लेता। मैं तो आसमान से ज़मीन पर गिर पड़ा। होडल के डबचिक गेस्टहाउसमें अन्नू कपूर का मेकअप चल रहा था, दो घंटे बाद मुहूरत शॉट लिया जाना था,

और ये क्या अड़ंगा! हीरोइन चौपाल पर नहीं चढ़ेगी तो फ़िल्म कैसे बनेगी। गांव की पंचायत अचानक लगभग खाप पंचायत जैसा सुलूक करने लगी। मैंने हिम्मतनहीं हारी। जातियों के वैमनस्य सामने आए। गांव के पढ़े लिखे लोगों को साथ लिया। दलित बस्ती में फिल्म की कहानी बताई। प्रशासन का दरवाज़ा खटखटाया। पुलिस में भी खाप के चौधरियों को पाया। पर साथ दिया गांव की घूंघट-छिपीमहिलाओं और लड़कियों ने। मैं सफल हुआ। आज में अपने उस अनुभव पर फ़िल्म बना सकता हूं। इस फिल्म में सिद्धांतविहीन राजनीति, राजनीतिविहीन सिद्धांत, हीन-महीन पुलिस-प्रशासन, जातिवाद, बेरोज़गार दिशाहीनों की आक्रामकता,आक्रामकता की सच्ची दिशा, औरतों का शोषण,

औरतों की ताक़त, रक्तविहीन हिंसा, हिंसाविहीन रक्त, क्या नहीं होगा। ब्रज की लोकधुनें तो ऐसी होंगी कि लोगों को झुमा देंगी। कल दिनभर बंचारी की घटनाएं दिमाग में घूमती रहीं। पटकथाका दिवास्वप्न चलता रहा, लेकिन सोच में स्थिरता नहीं रही। जैसे पहले मैं कोई काम करता था तो बस वही करता था। मेरे दिमाग में पता नहीं कहां-कहां के रायते फैले हुए हैं। दिल्ली आए हुए पूरे चालीस साल हो गए। कितने लोगों से मिला,बहुत लम्बी फिल्म रील है। किसी ज़माने के क़रीबी दोस्त कुंठित होकर दुश्मनी ठाने हुए हैं। वे धैर्य की परीक्षा लेते रहते हैं। कभी कोई व्यक्ति, कभी कोई आरोप, कभी कोई नि:संगता, कभी किसी अर्थ को खोजता हुआ कोई शब्द,

कभीकिसी शब्द की तलाश में छटपटाता कोई अर्थ। बैचैन खयालों के बिच्छू। डंक मारा और उड़नछू। जैसे अभी सोच रहा हूं। रायता फैलाना मुहावरा कैसे बना होगा? जैसे सफल से सफलता,

विफल से विफलता ऐसे ही राय से रायता बना होगा। लोगोंने राय फैलाई होंगी तभी रायता फैला होगा या फैली होगी रायता की प्रवृत्ति।

—रायते की बात छोड़, लड्डू-पूरी की बात कर। अब तौ त्यौहार ई त्यौहार ऐं लल्ला! अंधेन की बात मत कर, सावन की बात कर। चित्त आजकल सबके खराब ऐं। तेरी जिम्मेदारी ऐ कै उनैं ऊ ठीक कर, जिनके दिमाग कीली पै नायं।


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