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    दिल में कसकती है शॉल की याद

     

    —चौं रे चम्पू! मैडरिड में डेढ़ घण्टा बितायबे के बाद फिर का भयौ?

    —ड्राइवर ने सही समय पर रेल्वे स्टेशन पहुंचा दिया। मैं तो यहां से सर्दी झेलने का पूरा तामझाम लेकर गया था, लेकिन सर्दी थी नहीं। स्पेनवासी खुश थे कि उनकी सर्दियों में कैसे अचानक गर्मी आ गई। खूब भीड़-भड़क्का था और… स्टेशन पहुंचे तो यूरोप की सबसे तेज़ दौड़ने वाली रेल में बैठे, लेकिन चचा वहां एक हृदय-विदारक घटना हुई ।

    —सो का भई?

    —आभास मुझे वायादोलिद पहुंचने पर हुआ। एक मेरी प्यारी शॉल थी। बारह साल से मेरे साथ थी और कम से कम बारह बार खोई होगी। एक बार इटावा पर रेल से उतरे और बर्थ पर छोड़ आए। लखनऊ से आने वाली रेलगाड़ी से सुबह तक वापस आ गई। कभी किसी कविसम्मेलन में रह गई तो किसी कवि ने दे दी। किसी के घर पर छूटी तो ड्राइवर ने पहुंचा दी। एक बार एअरपोर्ट पर कहींगिर गई थी, जिसने दूर से गिरते हुए देखी थी, वह बेचारा शॉल लेकर मेरे पीछे दौड़ा, पर में कार में बैठ चुका था। उसने कार्गो के किसी कर्मचारी को दे दी

    कि कविजी को पहुंचा देना। कार्गो केमित्र ने कहीं से मेरा नंबर ढूंढ कर सूचित किया और

    मैं स्वयं वहां जाकर बिछुड़ी साथिन को ले आया। मुझे भरोसा हो गया था कि ये कभी खो नहीं सकती, पर इस बार भरोसा टूट गया।

    dil mein kasaktee hai shol kee yaad

     

     

     

     

     

     

     

    —का भयौ? कैसै खोई?

    —हुआ ये कि मैड्रिड एयरपोर्ट पर बाहर निकलने से पहले ही मैंने ठण्ड का इंतज़ाम करने के लिहाज से एक मफलरनुमा स्टोल निकाल लिया था, सामान आने पर अटैची से शॉल को भी निकाल लिया। मैड्रिड-दर्शन के दौरान मफलर गले में था और शॉल कार की सीट पर रह गई, लेकिन डॉ. जगन्नाथन ने देख ली और रेलवे स्टेशन जाते हुए मुझे दे दी। वहां कुली तो होते नहीं हैं। मेरे पासपहिए वाली, एक छोटी एक बड़ी, दो अटैचियां थीं। दोनों हाथ घिरे हुए थे। गर्म मफलर मेरी गर्दन को छू रहा था इसलिए ऐसा लग रहा था जैसे शॉल कंधे पर रखी हो, लेकिन इस बार चचा स्टेशन की जिस बैंच पर ज़रा देर के लिए रखी थी, वहीं से कोई उठा कर ले गया। या क्या हुआ, पता नहीं। वहां भी उठाईगीरों की कमी नहीं है। सबने सावधान किया था कि पर्स और सामान पर अपनी नज़र रखना। हाय, नज़र बचते ही कोई लेकर चलता बना। मुझे अंतिम तौर पर आभास हो गया कि अबके हम बिछुड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें। रात्रि-भोज के दौरान सबने धीर बंधाई, परबहुत याद आई। ऐसा ही दुःख मुझे हुआ था सेंट पीटरर्सबर्ग में, जहां उठाईगीरों ने मेरा कैमरा देखते-देखते ग़ायब कर दिया था। उस कैमरे ने भी मेरा बड़ा साथ निभाया था। उसके खोने पर तो मैंने कवितानुमा कुछ लिखा भी था।

    —सुना, का कबता लिखी?

    —कंधे पर सैर करने वाले मेरे बच्चे! मेरी हथेलियों पर उड़ने को बेताब मेरे श्याम कबूतर! कैसी गर्वीली अकड़ से तू गरदन घुमाता था, मुझे अपनी नज़रों से दुनिया दिखाता था। जितनी बार पलक झपकाईं तूने, आकाश का समंदर का, इंसान का बंदर का रोचक और भौंचक इतिहास बना। उठा ले गए तुझे आतताई, कहां-कहां से उमेठते होंगे निरदयी पापी! हाय री मेरी आपाधापी! नज़रों से ओझल कैसे होने दिया मैंने तुझे? कोमल आज्ञाकारी अवगाहा, अंधेरे में भी खींच लाता था मेरा मनचाहा। दिल खिंचा आता है तेरी याद में, पता नहीं क्या-क्या हुआ तेरे साथ बाद में! याद तो घनेरी, तुझे भी सताएगी मेरी! पर रोते हुए हृदय से यही दुआ है, खुश रहना जहां भी रहो मेरे प्यारे कैमरे! तुम बिछुड़े बुरा हुआ है!

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    —तो अब सौल पै ऊ कबता लिखैगौ?

    —चचा, उस शॉल पर तो खण्ड-काव्य लिखा जा सकता है। उसके साथ बड़ी यादें जुड़ी हुई हैं। कोमल और भावनात्मक स्मृति-स्पर्श। वैसे तो हर चौथे दिन किसी न किसी समारोह में मुझे शॉल मिलती रहती हैं, वे शॉल या तो बंट जाती हैं या किसी सुपात्र की खोज में अल्मारी में जगह घेरती रहती हैं। हाय, महकते पसीने और पश्मीने की मेरी प्यारी शॉल! तू भी ख़ुश रहना!

    —चल छोड़ दुःख की बात। आगे बता कै वायादोलिद में का भयौ?

     

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