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  • देहदान महादान

    —चौं रे चम्पू! बऊरानी ऐ लै आयौ हस्पताल ते?

    —हां चचा, आपकी बहूरानी अब स्वस्थ है, उन्हें घर ले आया और अपनी देह भविष्य के लिए अस्पताल को दे आया। चिकित्सा विज्ञान में जितनी तेज़ी से प्रगति हो रही है, उतनी तेज़ी से अभी मनुष्य की चेतना विकसित नहीं हुई। विदेशी लोग यहां से मानव अंगों की तस्करी कराते हैं और हमारे रोगी तड़प-तड़प कर मर जाते हैं। पुराण-गाथाओं को छोड़िए, लेकिन अंग प्रत्यारोपण का सिलसिला मेरी स्मृति में लगभग पचास साल पहले आंखों से शुरू हुआ था। नेत्रदान करिए, किसी के जीवन में ज्योति भरिए। बड़ा प्रचार होता था। चेतना आने पर लोग नेत्रदान का फॉर्म भरने लगे। अब सिर्फ़ नेत्रों की ही नहीं, मरणोपरांत शरीर के हर अंग की उपयोगिता है।

    —जैसै कौन कौन से अंग, बता!

    —मैंने अपनी कविता में बताए हैं, ‘दिल, दिमाग, किडनी, लिवर! आंख, आंत, फेंफड़े, जिगर! पित्त, तिल्ली! पेट की झिल्ली! रक्त, रक्त की नलिकाएं! पूरे शरीर की विभिन्न कोशिकाएं! कार्टिलेज, वॉल्व, पैंक्रियाज़! बोन्ज़, बोन मैरो और त्वचा! और हम समझते हैं कि उस शरीर में कुछ नहीं बचा! और भी कुछ बचा होगा जो मिलेगा शोध से, लेकिन हमारे इस बोध से, कि जब ये अंग पुन: बुन सकते हैं किसी मरणासन्न की ज़िंदगी का ताना-बाना, तो क्यों इस अनमोल सम्पत्ति को फूंकना-जलाना, दफ़नाना-दबाना? क्यों नदी में बहाना या चील-गिद्धों को खिलाना?

    —फिर का करें अंतिम संस्कार में?

    —रीतियां समय के साथ सदा बदली हैं। प्रियजन की मृत्यु पर अपना मुंडन क्यों करो? कैश राशि मिल गई, मृतक की थोड़ी केश-राशि रख लो। अब तो एक बाल से ही डीएनए निकल आता है। पूर्वजों का दैहिक इतिहास जमा होता जाएगा। जिसका जो कर्मकांड है, अपने मन की तुष्टि के लिए, चंद केशों के साथ, अपने धर्मानुसार करे। इसमें क्या बाधा? दो-तीन सदी पहले फ़ोटो कहां थे। फ़ोटो के साथ परम्पराएं निभाओ। सोचो, सिर्फ़ एक लिवर ही आठ लोगों के प्राण बचा सकता है। सो हम कर आए अपना देहदान। अब हैल मिले या हैविन, रजिस्ट्रेशन नम्बर है फोर सैविन नाइन सैविन।

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