अशोक चक्रधर > Blog > चौं रे चम्पू > दीपमालिका पहलू कालिमापदी दहलू

दीपमालिका पहलू कालिमापदी दहलू

दीपमालिका पहलू कालिमापदी दहलू

 

—चौं रे चम्पू! इत्ती मिठाई चौं लै आयौ रे?

—पूरी बगीची के लिए लाया हूं चचा, क्या परेशानी है? दीपावली का पहलू ये है कि कुछ लोग मनाते हैं और दहलू ये कि कुछ लोग नहीं मनाते हैं, या कहें कि कुछ लोग मना ही नहीं पाते हैं। दीपावली पर सजाई जाती है दीपमालिका। दीपमालिका यदि पहलू है तो इसका दहलू है- कालिमापदी। आप दीपमालिका के सभी अक्षरों को उल्टी तरफ से पढ़िए तो आप पाएंगे, ध्वनि निकल रही है- कालिमापदी। कालिमापदी को उल्टी तरफ से पढ़िए तो दीपमालिका हो जाएगी। शब्द अगर ब्रह्म है तो ब्रह्मा ने ये अच्छा शब्द सिक्का चलाया है।

—हां रे, दीपमालिका कौ उल्टौ कालिमापदी भयौ! बिल्कुल ठीक!

—अब तुम्हारा चम्पू चिंतन की चक्की को थोड़ा और घुमाता हैं। देखिए, लक्ष्मीजी अपने वाहन उल्लू पर बैठकर आती हैं तब उनके पैर उल्लू के पंखों में छिप जाते हैं। जब वह धरती पर लैंड करती हैं तो अपने वाहन से सीधे कमल पर आकर खड़ी हो जाती हैं। इस नाते हम देख नहीं पाते हैं कि सर्वांग भव्य-दिव्य लक्ष्मीजी कालिमापदी हैं। अर्थात काले पैरों वाली हैं। उनके चरण चूंकि कमल में छिपे रहते हैं अतः दिखाई नहीं देते। काले पैरों का अर्थ काले धन का है। लक्ष्मीजी के पैर तो निश्चित रूप से गोरे होंगे पर काले धन की शक्तियों ने चरणस्पर्श कर कर के उन्हें कालिमापदी बना दिया है। दीपमालिका उन्हीं भवनों में लंबी होती है जहां काला धन ज़्यादा हो।

—कारौ धन कोई बुरी चीज ऐ का?

—किसने कहा बुरी चीज़ है। उसी के आधार पर तो हमारे देश का विकास, चुनावों का प्रयास, कौन गौण कौन खास, जैसे मसले तय होते हैं। काले धन का स्वभाव काला नहीं होता, भाव काला होता है। उसी से भवन बनते हैं, उसी से चमन खिलते हैं, उसी को नमन होता है, उसके गमन पर दीवाली दीवाले में बदल जाती है। निष्कर्षतः दीपावली का एक पहलू है प्रकाश की जगर-मगर तो दहलू है अंधकार की अगर-मगर। जहां जगर-मगर है वहां चेहरों पर उजाला है, अनार क्या फूटते हैं हंसी के रोशनीदार फव्वारे फूटते हैं। उल्लास के सुर्री-पटाखे, धूम-धमाके उजाले की श्रीवृद्धि करते हैं। लेकिन इसका अगर-मगर वाला दहलू देखें तो इन पटाखों के कारण निकले हुए धुएं से मलिन बस्तियों के बच्चों के चेहरे और काले हो जाते हैं।

—पहलू के और दहलू बता।

—दीपावली पर हम सिक्का उछालते हैं। राम वाली साइड ऊपर आ जाती है लेकिन रावण हथेली को टच करता है। रावण के हथेली टच करते ही हथेली में खुजली होने लगती है और हथेली में खुजली होते ही कालिमापदी दौड़ी-दौड़ी आती है और दीपमालिका सज जाती है। जिस दिन शोले फिल्म की तरह सिक्के का पहलू और दहलू एक जैसा हो जाएगा यानि रावण किसी तरफ नहीं होगा तभी रामराज्य आएगा। गांधी जी ‘हे राम’ कहकर सिधार गए पर जब हम अर्थव्यवस्था में से सिक्कों का चलन समाप्त होने पर हर प्रकार के नोट में उनके दर्शन करते हैं तो रामराज्य का सपना अभी भी उनके चेहरे पर दिपदिपाता दिखाई देता है।

 

laxmi mata

 

 

 

 

 

—नोट में जो तार होय वो दोनों तरफ ते दिखाई देय।

—यह तार ही भारत को तारने वाला है, यह तार असली और नकली में भेद करने वाला है, यह तार ही है जो दीपावली के अवसर पर इंसान को इंसान से जोड़ता है और गांधी जी की सपनीली मुद्रा के साथ हमें लगातार याद दिलाता है कि हमारी मुद्रा अभी डॉलर के मुकाबले कमज़ोर है। हम उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब रुपए के बल पर अपने देश में डॉलर की झालर लगाएंगे और शिवकाशी के बच्चे कम्प्यूटरों की मदद से ऐसे सुर्री-पटाखे बनाएंगे जो डॉलर के कागज़ से तैयार होंगे। उस दिन हमारा पहलू के साथ दहलू भी दुरुस्त हो जाएगा। समस्या ये है कि देश में उजाले कम और जाले ज़्यादा हैं। चलिए सब मिलकर लक्ष्मीजी से अनुरोध करते हैं कि वे अपने वाहन उल्लू का ‘उ’ हमें दे दें, जिसे हम जाले में लगाकर हर जाले को उजाले में बदल सकें।


 


Comments

comments

1 Comment

  1. tanmay sharma |

    भव्य !

Leave a Reply