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    छोटे से कदम से ऊंची छलांग

     

    —चौं रे चम्पू! तोय वो दिन याद ऐ जब इंसान के कदम चन्द्रमा पै पड़े?

    —हां चचा, साल-महीना तो पहले से याद था, उन्नीस सौ उन्हत्तर की जुलाई। नील आर्मस्ट्रांग के निधन का समाचार पढ़ा तारीख भी पता चल गई, बाईस। मैं उस दिन अपनी ननिहाल इगलास में था जब धरती की कक्षा से निकल कर नील आर्मस्ट्रांग, एल्ड्रिन और माइकल कॉलिन्स चन्द्रमा की कक्षा में प्रविष्टहुए। मैं बीएससी की कक्षा से निकल कर बीए की कक्षा में प्रविष्ट होने की जद्दोजहद कर रहा था। टीवी तो था नहीं, रेडियो से कान चिपके रहते थे। आंखों देखा हाल कुछ इस तरह बताया जाता था कि सचमुच दृश्य दिखाई देने लगते थे। नील आर्मस्ट्रांग ने कहा था कि इंसान के एक छोटे से कदम से मानवता ने ऊंची छलांग लगाई है। मैं विज्ञान  छोड़ कर  कला में छलांग लगाना चाहता था। मेरी छलांग भी कम महत्वपूर्ण नहीं थी। बहरहाल, मुझे तीन तत्वों पर चिंतन करने का मौका मिला।

    —अपने तत्वन्नैं बताय दै लल्ला।

    —पहला तत्व सौन्दर्य, दूसरा अन्धविश्वास और तीसरा भ्रष्टाचार।

    —लल्ला हम बात कहीं की करैं, और तू कहीं और लै जाय उनैं।

    —दरसल चचा, मुझे काका हाथरसी जी याद आए। काका उन दिनों धर्मयुग में फुलझड़ियां लिखा करते थे और समकालीन विषयों को समेटते थे। उन्होंने तीन कुंडलियां लिखीं। मैं तुम्हें सुनाता हूं, पहली कुंडली है, ‘पहुंच गए जब चांद पर एल्ड्रिन, आर्मस्ट्रांग, शायर कवियों की हुई काव्य-कल्पना रौंग। काव्य-कल्पना रौंग, ’सुधाकर’ हमने जाने, कंकड़-पत्थर मिले, दूर के ढोल सुहाने। कहं काका कविराय, खबर यह जिस दिन आई, सभी चन्द्रमुखियों पर घोर निराशा छाई।’ चन्द्रमा पर उतरना किसी मनुष्य का, ये कल्पनातीत था और वे कवि जो कल्पनाओं में खोए रहते थे, उनकी कल्पनाओं पर कुठाराघात हुआ। सुन्दरियां चन्द्रमुखी कहलाती आई हैं, नील आर्मस्ट्रांग कंकड़-पत्थर बटोर लाए थे, तो काका चूके नहीं। कवियों की सौन्दर्य दृष्टि में बदलाव आना चाहिए पर आया कहां, आज भी चन्द्रमा सौन्दर्य का प्रतीक बना हुआ है। धरती पर आबादी इतनी बढ़ जाए कि चन्द्रमा पर कॉलोनी कटें, और यहां से अमीर लोग छंटें, तो बात दूसरी है। इस तरह पहला तत्व हुआ सौन्दर्य।

    —अच्छा दूसरौ बता!

    —दूसरा अन्धविश्वास! चन्द्रमा से जुड़े हुए जितने भी अंधविश्वास थे उन पर काका ने प्रहार किए। मुझे उस समय की उनकी एक कुंडली याद है जिस समय उन्होंने अपोलो के उतरने पर लिखा था, ’पार्वती कहने लगीं, सुनिए भोलेनाथ, अब अच्छा लगता नहीं चन्द्र आपके माथ। चन्द्र आपके माथ, दया हमको आती है, बुद्धि आपकी तभी ‘ठस्स’ होती जाती है। धन्य अपोलो! तुमने पोल खोल कर धर दी, काकीजी ने करवाचौथ कैंसिल कर दी।’ जिस चन्द्रमा को देखकर गृहणियां करवाचौथ का व्रत खोलती थीं, आज भी खोल रही हैं, लेकिन व्यावहारिकता में प्रगतिशील चिंतन के पुरोधा काका ने काकी के माध्यम से करवाचौथ पर प्रहार किया। अंधविश्वासों और जड़ कर्मकांड पर हास्य के ज़रिए प्रहार किया। मेरे मस्तिष्क में ये भावात्मक साहचर्य मंडरा रहे हैं चचा! कोई भी चीज़ किसी भी चीज़ से जुड़ जाती है। अब नील आर्मस्ट्रांग से चन्द्रमा जुड़ गया, चन्द्रमा से काका जुड़ गए, काका से कुंडलियां जुड़ गईं।

    —अब तीसरौ तत्व बता!

    —तीसरा भ्रष्टाचार! काका वहां भी नहीं चूके। उन्होंने लिखा, ‘चन्दामल से कह रहे ठाकुर आलमगीर, पहुंच गए वे चांद पर, मार लिया क्या तीर! मार लिया क्या तीर, लौट पृथ्वी पर आए, हुए करोड़ों खर्च, कंकड़ी-मिट्टी लाए। इनसे लाख गुना अच्छा, नेता का धन्दा, बिना चांद पर चढ़े, हजम कर जाता चन्दा।’ मैं सिर्फ़ ये कहना चाहता हूं चचा कि बड़ी-बड़ी घटनाएं होती हैं। निश्चित रूप से नील आर्मस्ट्रांग याद किए जाएंगे, लेकिन इन स्ट्रांग पंक्तियों को भी याद किया जाना चाहिए, जो चन्द्रयात्री या चन्द्रमा के बहाने आज भी आज के यथार्थ को रेखांकित कर रही हैं। कल्पनाओं में बसे बहुत दूर के यथार्थ पर जाने से पहलेनिकट के विकट यथार्थ की धरती पर तो चरण रखें। विज्ञान का मिजाज़ प्रकृति से लड़ने का है और कलाओं का प्रकृति से जुड़ने का। मैं परम प्रसन्न हुआजब विज्ञान से कला-क्षेत्र में आ गया। छोटे से क़दम से लगाई ऊंची छलांग! मानोगे कि नहीं!

    wonderful comments!

    1. Deepak Sharma अगस्त 29, 2012 at 7:48 अपराह्न

      Sadar Pranam Sir.

    2. Deepak Sharma अगस्त 29, 2012 at 7:48 अपराह्न

      Sadar Pranam Sir.

    3. Deepak Sharma अगस्त 29, 2012 at 7:48 अपराह्न

      Sadar Pranam Sir.

    4. siddharth अगस्त 30, 2012 at 8:41 अपराह्न

      Sir, Aapki jeevan ki saari smritiya sun kar maza aa jata hai, khaskar aapke bacchpan ki smritiya :)))

    5. Shiksa Bharti अगस्त 31, 2012 at 4:14 पूर्वाह्न

      Ati sundar sir g

    6. Shiksa Bharti अगस्त 31, 2012 at 4:14 पूर्वाह्न

      Ati sundar sir g

    7. Shiksa Bharti अगस्त 31, 2012 at 4:14 पूर्वाह्न

      Ati sundar sir g

    8. Vikas Singh सितम्बर 3, 2012 at 12:25 अपराह्न

      Sir, Jab bhi aapko padta ya sunta hu to bahut prasannta hoti hai or Garv bhi ki aap jaise Kavi, Lekhak, Teacher or Philosopher hamare Barat-varsh me hai or man me andar kahi malal bhi ki kash college time me aap mere teacher hote to aapse kitna kuch sikhne ko milta mujhe Kavita, Lekhan or philosophy k bare me.

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