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छत की खपरैल पर एक गुरिल्ला

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छत की खपरैल पर एक गुरिल्ला

(कोई काम बन जाए तो वाहवाही का मज़ा लेते हैं, न बने तो छोटों को सज़ा देते हैं।)

 

दिन : मंगल

स्थान : हिमाचल का जंगल

(एडीएम का आवास)

समय : सुबह सात के आसपास।

सिचुएशन : छत की खपरैल पर

आता है एक गुरिल्ला,

एडीएम थक जाता है चिल्ला-चिल्ला।

फिर थोड़ा दिमाग़ ख़र्च करता है,

‘गुरिल्ला पकड़ू’ गूगल-सर्च करता है।

बात बन जाती है एक ही ईमेल से,

पिंजरेदार वैन आती है

जंतुओं की जेल से।

अर्द्धनग्न व्यक्ति, टार्जन सा डीलडौल है,

वैन से उतरता है

जिसके हाथ में पिस्तौल है।

गोदी में उसके है कुत्ते का पिल्ला,

छत से सब कुछ देख रहा है गुरिल्ला।

टार्जन पिस्तौल एडीएम को थमाता है,

रूफ़ का फ़ूलप्रूफ़ प्लान बताता है—

—अपुन गुरिल्ला के साथ करेगा कुश्ती,

हमारा वैल-ट्रेंड पिल्लू बिना धींगामुश्ती,

भौंक-भौंक के उसे कंफ़्यूज़ करेगा,

दैन अपुन अपना मसलपावर यूज़ करेगा।

फेंक देगा गुरिल्ले को नीचे,

पिल्लू काटेगा उसे हिप्स के पीछे।

गुरिल्ला घबरा के अपने आप,

पिंजरे में बैठ जाएगा चुपचाप।

ये मेरा वैलटैस्टेड तरीक़ा है,

मैंने अपने लंबे तजुर्बे से सीखा है।

ओके! चलो अब आराम हराम है!

—ओके! पर पिस्तौल का क्या काम है?

—मान लो पलट जाए मौक़ा-ए-माहौल,

गुरिल्ला हमें फेंके तो

दाग देना पिस्तौल!

रैस्पैक्टपूर्वक जाने देना गुरिल्ले को,

और मार देना इस हरामी के पिल्ले को।


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