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    चट्टे मियां बट्टे मियां

    (लोकतंत्र का बड़ा रहस्यवादी लोक है चुनाव-तंत्र)

     

    थैली से निकलकर

    चट्टे मियां ने चुनाव लड़ा,

    थैली से ही निकलकर

    बट्टे मियां ने भी चुनाव लड़ा।

    चट्टे मियां जीत गए

    थैली में आ गए,

    बट्टे मियां हार गए

    थैली में आ गए।

    थैली मगर थैली थी

    खुशियों में फैली थी|

     

    बोली— मेरी ही बदौलत

    ये सब हट्टे-कट्टे हैं,

    और कोई फ़र्क नहीं पड़ता मुझ पर

    कोई हारे या जीते

    ये सब मेरे ही चट्टे-बट्टे हैं।

     

    अगली बार चट्टे मियां और बट्टे मियां

    फिर से मैदान में आए,

    मूंछों में मुस्कुराए।

     

    चट्टे बोला—  देख बट्टे!

    हमारे अनुभव

    कभी मीठे कभी खट्टे रहे,

    सुख दुख तो दोनों ने

    बराबर ही सहे।

    पर इस बार स्थिति मज़ेदार बड़ी है,

    हम दोनों वोटर हैं

    चुनाव में जनता खड़ी है।

    बोलो कौन सी जनता लोगे?

    मुझे कौन सी दोगे?

     

    और बंधुओ,

    कवि ने उस समय खोपड़ी धुन ली,

    जब सुख, समृद्दि

    और ख़ुशहाली के लिए

    चट्टे और बट्टे ने

    एक एक जनता चुन ली।

     

     

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