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चन्द्रमा को नाक पकड़ कर झिंझोड़ दिया

चन्द्रमा को नाक पकड़ कर झिंझोड़ दिया

 

—चौं रे चम्पू! कौन सी रस्मी की बात करि रह्यौ ऐ तू?

—रश्मि खेरिया! बताया तो था आपको, उसकी राखी भी बांधी है आपने।

—भूल गयौ, फिर कित्ती बता!

—अरे चचा, दस साल पहले एक श्रोता मित्र बजरंग खेरिया अपनी पत्नी को लेकर गेस्टहाउस आए थे, जहां सारे कवियों को ठहराया हुआ था। सुन्दर सी मारवाड़ी दुल्हन, खिलखिलाती हुई, ठहाके लगाती हुई। बताया गया कि कविताएं लिखती हैं। बजरंग जी की कामना थी कि शाम के कविसम्मेलन में रश्मि भी कविता सुनाए। वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश आदित्य जी ने सलाह दी किआयोजक से बात कर लीजिए। मुख्य आयोजक का सरोकार था कि जमती हैं कि नहीं जमतीं। आदित्य जी ने कविता देखी, उन्होंने कविता मुझे थमा दी और ताश-क्रीड़ा में तल्लीन हो गए। मैंने कविता पढ़ी। कूड़ा बीनने वाली महिला को लेकर थी। मेरे मन-मिजाज को अच्छी लगी।  मैंने कहा, रश्मि आपकी भावनाएं तो बहुत अच्छी हैं लेकिन मंच के अनुरूप शिल्प नहीं है इसका। मैंने थोड़ी सी कलम चलाकर कविता को प्रवाहपूर्ण और तुकबद्ध कर दिया। शाम को रश्मि ने साइंस सिटी के सभागार में आत्मविश्वास के साथ सुनाई। दूसरे मंजे हुए कवियों की तरह हाहाकारी तालियां तो न बजीं, लेकिन लोगों ने पसन्द किया और जहां मार्मिक प्रसंग थे वहां तालियां भी बजीं। मैं संचालन कर रहा था।

—संचालक चाहै तौ कमजोर कबी कूं ऊ जमाय सकै।

—अगली बार जब मैं कोलकाता गया तब अण्डमान निकोबार, काला पानी के जीवित स्वतंत्रता-सेनानियों की उपस्थिति में एक कविसम्मेलन नेताजी सुभाष इंडोर स्टेडियम में होना था। रश्मि का फोन आया। मैंने कह दिया था कि अगर तुम्हारी कामना इस बार भी सुनाने की है तो काला पानी पर कविता लिखो। संचालन इस बार भी मुझे ही करना था। अरे जी, रश्मि ने तो लिख डाली और पन्द्रह-बीस हजार की भीड़ में सुनाने में भी कोई संकोच नहीं हुआ। भावांजलि की एक छोटी सी कविता थी, पहले से ज़्यादा पसन्द की गई। 15 अगस्त का दिन था। रक्षाबंधन का त्यौहार उसके एकदिन आगे या पीछे था। गेस्टहाउस में कवि ही एक दूसरे को राखी बांध रहे थे। मैंने किसी पुरुष से राखी नहीं बंधवाई। कवयत्रियां अलग कहीं ठहरी थीं।

सोच रहा था कि नीचे उतर कर किसी बच्चीसे बंधवाऊंगा। रश्मि आई तो मैंने उससे बांधने को कहा। वह प्रसन्न हो गई।

मैं पैसे देने लगा तो उसने शायद लिए नहीं। एवज में मैं उसे एक मूल-मंत्र देकर आया कि कविसम्मेलन को लक्ष्य न बनाओ,

बस लिखती रहो, लिखती रहो और लिखती रहो। वह लिखती रही, फोन पर सुनाती भी रही। उसके बाद हर साल रश्मि की ढेर सारी राखियों का एक डिब्बा मेरे पास आने लगा। साथ में पता नहीं और क्या-क्या भेज देती थी। कुर्ते का कपड़ा, कभी भाभी के लिए साड़ी और खुद बनाई हुई रंग-बिरंगी सुरुचिपूर्ण साड़ियां। अगली बार कोलकाता गया तो उसके घर भी गया। खाना खाया, वह भी सुस्वादिष्ट। मैंने पाया कि रश्मि के अन्दर चित्रकारी शिल्पकारी की कला भी है। बड़े मनोयोग से चीजों को गढ़ती बुनती और बनाती है। लेकिन इस बार तो मेरी हैरानी का कोई ठिकाना नहीं रहा, जब मैंने उसकी एक प्रकाशित  पुस्तक पढ़ी, ‘अपने होने का सच’। सच में चचा, अद्भुत कविताएं थीं। अब रश्मि के दिमाग़ से कविसम्मेलनों का भूत उतर चुका है। गज़ब के बिम्ब आते हैं उसकेदिमाग़ में।

किताब यों ही बीच से खोली, मुझे एक कविता दिखाई दी।

—कौन सी कबता?

—चचा, ‘कब्बू’ शीर्षक कविता थी। इस कविता में कुछ है जो स्त्री मन की भावनाओं को अभिनव प्रतीकों और अभिव्यक्तियों में ढालकर परोसता है। कब्बू एक कबूतर है जो खिड़की पर आ जाता है और घुला-मिला इतना है कि आकर उंगली पर बैठ जाता है। उसकी चोंच ऐसी जैसे दो लौंग जोड़ दी गई हों। उसके पंखों ने रश्मि की कल्पनाओं के पंख खोल दिए। वह एक कबूतर बन जाए औरउड़कर चन्द्रमा की नाक पकड़ कर झिंझोड़ सके ताकि वह इधर-उधर जो ताकता-झांकता रहता है, लोगों के अनछुए जीवन को, उससे बाज़ आए।

—भड़िया है रे!

—अचानक उसने पुस्तक छीन ली। घर जाकर पढ़िएगा। बाज़ार ले गई।

अपनी भाभी के लिए साड़ियां दिलवाईं और तुम्हारे लिए एक अंगोछा।

 


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