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बुराई में छिपी अच्छाई के चरणों की आहट

बुराई में छिपी अच्छाई के चरणों की आहट

 

—चौं रे चम्पू! एफ-वन की रेस में है आयौ?

—हां चचा! एफ वन की रेस देखी। फाइनल मुक़ाबला!

 

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—का देखौ वहां पे?

—चचा, वहां अमीरी की रफ़्तार देखी और रफ़्तार की अमीरी देखी। एक-एक कार पचास-पचास करोड़ की है। सत्ताईस कार दौड़ रही थीं, लगा लो हिसाब कि इस खेल का खिलौना कितना महंगा है। अब उस खिलौने को दौड़ाने के लिए जो ट्रैक बना है, वो दो हज़ार करोड़ का है। इस परनाक-भौं चढ़ाने वालों की भी कमी नहीं है। इस पर गर्व करने वाले भी करोड़ों में हैं। रेस शुरू होने से पहले मैंने अपनी सोशल नेटवर्किंग साइट पर वहां का एक चित्र और एक टिप्पणी डाली थी ‘अब रह गया आधा घंटा। देखेंगे रफ़्तार अमीरी की’। मित्रों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आईं। महेन्द्रदुबे ने लिखा ‘रफ़्तार के साथ भागती अमीरी-गरीबी की खाई पाटने का काम कौन करेगा?’ भूपी सूद बोले, ‘हां इसे देखेंगे भी अमीर ही’। वीरेश मलिक बोले, ‘प्लीज़ बी केअरफुल, ग्रेट इंडियन ग्रां प्री की कारों में हॉर्न नहीं हैं।’ गौरव सक्सेना साहिल ने लिखा

‘मैं पूरे भरोसे से कह सकता हूं किभारत की पिचासी प्रतिशत जनता को इसकी जानकारी तक न होगी’। रुचित यादव कहने लगे, ‘फार्मूला समझा दो ना भैया! जे कार है तौ का हमारे इंदौर की सड़क पर चल सकती है? जे खेल है तो का हम खेल सकत हैं? संजय धवन  ने  लिखा  कि  न तो मैं मोटर-स्पोर्ट्स का समर्थक हूं नपब्लिक का पैसा फूंके जाने का, लेकिन मैं समझता हूं कि हर प्रकार के विकास में आम और ग़रीब आदमी के लिए कुछ लाभकारी प्रभाव होंगे।

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भले ही छोटे हों, भले ही देर से हों। बुराई व दुःख साहित्य के जनक हैं। यह नहीं होते तो साहित्य नहीं होता, केवल इतिहास होता, वह भी अरोमांचक।’राजमणि श्रीवास्तव कहने लगे, ‘कार तो गुज़र गई …बस लोग रफ़्तार देखते रहे’। इस पर विजय कुमार ने कहा, ‘कारवां गुजर गया.. और गुबार भी नहीं दिखा!’

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—धवन की बात सई लग रई ऐ रे!

—चचा, कौशल तो है, ऐसी कार चलाने में। किसी भी क्षेत्र में कोई अद्वितीय है, उसे मान मिलना चाहिए। उस कार को चलाने वाले के पास, मन की एकाग्रता, रफ़्तार पर नियंत्रण और आत्मसंयम होना चाहिए। तेज रफ़्तार के कारण वजन कम हो जाता है, शरीर असंतुलित, विचलित हो सकताहै, अपने आपको दिल-दिमाग़ से चुस्त बनाए रखना, एक चुनौती होता है।

 

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—सो तो है! जे काम तौ दूसरौ ऊ कर सकै, अगर मौका मिलै और पचास करोड़ की कार दई जाय। जमानौ भौत बदल गयौ ऐ लल्ला! हमारी सोच ते परे।

—सोच से परे जाना ही तो विकास का लक्षण होता है। हर विकास को ह्रास की तरह देखा जाता रहा है और हर ह्रास में छिपे हुए उजास को पहचाना नहीं गया किसी भी ज़माने में। पांच-दस साल बाद जब इस ट्रैक पर सैंकड़ों रेस हो चुकी होंगी, तरह-तरह के खेल हो चुके होंगे, तब फेसनिकलकर आएगा हमारे भारत का।  जब ओलम्पिक में हमारे भी खिलाड़ी जाएंगे और गोल्ड मैडल लाएंगे। इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में एक युवा और आत्मविश्वास से दिपदिपाता हुआ भारत निकल कर आया है।

हर क्षेत्र में सुपर पावर बनना है तो खेलों में क्यों नही! खेलों को किसीगतिविधि की तरह नहीं, जीवन शैली की तरह लेना चाहिए। खाने, पहनने, सोने और जीने के समानांतर। कैसी भी आड़ी-तिरछी स्थितियों में ट्रैक बना हो, हर बुराई में छिपी हुई अच्छाई के चरणों की आहट देखनी चाहिए। हालांकि अभी इस ग़रीब देश के लिए ये अमीरी की एय्याशी हो सकतीहै, लेकिन दस साल बाद हो सकता है, ये बहुत तराशी हुई लगे और इसके बनाने वालों को आगे आने वाली पीढ़ी धन्यवाद दे कि हां ज़माने की रफ़्तार के साथ हमने रफ़्तार की अमीरी देखी है और अमीरी की रफ़्तार हम तक भी आ पहुंची है। कल्पना करने में क्या जाता है। कल्पना करो कि इसभूमण्डलीकरण के बाद जिस मध्य वर्ग की हालत तेजी से अच्छी हुई है, वहीं निम्न वर्ग की हालत भी तेजी से अच्छी होगी। क्यों चचा!

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