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बुक सेलर, कीपर और मेकर

बुक सेलर, कीपर और मेकर

 

–चौं रे चम्पू! आस्ट्रेलिया के कैसे ऐं हालचाल?

–चचा, आस्ट्रेलिया खुश है फिलहाल! मौसम सुहाना है। न बहुत सर्दी है, न गर्मी। रात में आकाश में चन्दा-तारे साफ़ नज़र आते हैं। दिन में चिलचिलाती धूप होती है, खिलखिलाते बच्चे, जगमगाती गाड़ियां, चमचमाती मेट्रो, दनदनाती हुई प्रगति और इन सब के बीच में कामना है कि हिन्दी हृदय की सवारी करती रहे। वैश्विक भाषा के रूप में अपनाई जाए। लोगों से मिल रहा हूं। उनकी सुनरहा हूं, अपनी सुना रहा हूं। बाकी समय में लिखाई-पढ़ाई, कुछ देखन कुछ लेखन।

–अरे देखन की बता, का देखौ?

–बहुत कुछ देखा, पर यहां आकर एक आदमी को मिस कर रहा हूं, नाम है उनका बॉब गूल्ड।  पिछली बार दो साल पहले आया था, उनसे मुलाक़ात हुई थी। किंग्स स्ट्रीट, न्यूटाउन में उनकी एक बहुत बड़ी सैकिंड-हैंड किताबों की दुकान है। सुबह आठ बजे से आधी रात तक, सप्ताह में सातों दिन खुलती है। मैं जब भी ऑस्ट्रेलिया आता हूं, उस दुकान पर ज़रूर जाता हूँ। इस बार पता चला किपिछले साल बाईस मई को वे बहुत ऊपर चले गए। उनका चेहरा स्मृति-कोश में मुस्कुराने लगा। सफेद दाढ़ी मूंछ और भव्य ललाट। वे किताबों के बीच छिपे नहीं छपे रहते थे, दुकान के टाइटिल कीतरह।

दुनिया की सबसे बड़ी किताबों की दुकान तो कहते हैं कि टोरंटो, कनाडा में है, पर वहां सैकिंड-हैंड भी मिलती होंगी,

पता नहीं। गूल्ड के बुक आर्किड में अगर आप एक बार घुस गए तो मनकरेगा यहां से कभी बाहर मत निकलो।

यहां जो किताबें है वे प्रकाशकों द्वारा आरोपित किताबें नहीं हैं, उपभोक्ताओं द्वारा इस्तेमालित और बॉब गूल्ड द्वारा चयनित किताबें हैं।

वे स्वयं एकप्रगतिशील राजनैतिक कार्यकर्ता थे। वियतनाम-युद्ध के विरोध में जेल भी काट आए थे। उनकी दुकान में मार्क्सवादी इतिहास की ख़ूब सारी किताबें हैं, ऐसी जो अब मुश्किल से मिलेंगी।

—तैनैं कित्ती खरीदीं।

—मन तो बहुत किताबों के लिए करता था चचा, पर वज़न की समस्या रहती थी। फिर भी ख़रीदीं। मैंने चार्ली चैपलिन की जीवनी यहीं से ख़रीदी थी। इस दुकान में बहुत वक़्त बिताया करता था। जैनुइन ग्राहक की रुचि जानने के बाद वे ढूंढने में मदद भी करते थे। उनसे किसी विषय में बात करो तो देर तक समझाते थे। उच्चारण के कारण कई बार जब उनकी बातें मेरी समझ में नहीं आती थीं तो मैं आधी सुनकर ही ऊपर चला जाता था। वे पीछे पीछे आ जाते थे और बताते थे कि अमुक विषय से जुड़ी हुई उनके पास कितनी किताबें हैं। दो तल की विराट दुकान में लकड़ी की सीढियां, दसियों गलियारे, हर गलियारे में हज़ारों किताबें। ज्ञान की महक। अब उनकी बरसी वाले दिन बाईस मई को जाऊंगा दूकान पर। तेईस को वापस दिल्ली। बहरहाल, गूल्ड एक ऐसा बुकसेलर था जो सिर्फ़ किताबें ही नहीं सपने भी बेचता था।

—एक किताब हमाए ताईं लै अइयो!

—ज़रूर, पर हल्के वज़न की भारी किताब लाऊंगा। ऐसी जैसे रेसकोर्स में जॉकी होते हैं, वज़न में हल्के पर भारी काम करने वाले। ब्रिसबेन में घुड़दौड़ देखी थी चचा।

—घुड़दौड़ में कैसै पहौंच गयौ?

—गया तो था हिन्दी-प्रेमियों से मिलने। मंजु जैन ने इलासा नामक संस्था की ओर से लगभग पचास-साठ लोगों को बुलाया हुआ था। वहां ब्रिस्बेन के काउंसलर भी आए हुए थे। अच्छा आयोजनरहा। अगले दिन मनु हिंगोरानी अपनी पत्नी सोनिया और हिन्दी सीखने वाले अपने दोनों बच्चों के साथ हमें ब्रिसबेन घुमाने ले गए। डूम्बन में चल रहा था रेस-फ़ैस्ट। बुक-सेलर से तो मिल नहींपाए, अनेक बुक-कीपरों यानी बुकीज़ के दर्शन ज़रूर हुए। बुकीज़ होते हैं वे जो घोड़ों पर दांव लगाने वाले लोगों का हिसाब रखते हैं। ये अपने ग्राहकों और घोड़ों के मनमिजाज को पहचानते हैं। जीवन में पहली बार रेस देखी और ये भी देखा कि इंसान अपने मनोरंजन के लिए इंसानियत के साथ कैसे खिलवाड़ करता है। घोड़े बलिष्ट होते हैं, लेकिन दौड़ से पहले सवार के साथ तोले जाते हैं।घोड़े का वज़न तो कम कर नहीं सकते, सवार का कर दिया जाता हैं। ख़ैर, मैं बुकमेकरी भी कर रहा हूं यहां, अगली किताब बनाने में लगा हूं।

–लग्यौ रह पठ्ठे!

–हां, अभी लिखने दो, आगे बताऊंगा आगे की बातें।


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