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बिना विचारे बोलने पर बिचारे की मौत

बिना विचारे बोलने पर बिचारे की मौत

 

—चौं रे चम्पू! लोग बिना बिचारे कछू कौ कछू बोल दैंय, बाद में पछतामैं ऊ नायं, जि का चक्कर ऐ रे?

—ऐसा नहीं है कि बिना विचारे बोलने वाले कोई विचार नहीं करते। उनका तत्काल दिमाग सोचकर ही बोलता है। हां, बोलने से पहले उनके मन में उसके परिणामोंकी भयावहता का अन्दाज़ा शायद नहीं रहता। बेनी प्रसाद के बैन कांग्रेस को भारी पड़ रहे हैं। बोल गए तो बोल गए। पछतावा भी किस बात का! उनके मन मेंकवि जागा और वे वक्रोक्ति का इस्तेमाल करने लगे। वाग्विदग्धता भी एक तरीक़ा है। किसी बुराई को अच्छाई बता दो और उसकी तार्किकता अपने मन मेंगढ़ लो। थाली अगर महंगी हुई है तो बेनी प्रसाद जी ख़ुश हैं। इससे तो किसानों का भला हो रहा है। हर बुराई में कोई न कोई अच्छाई छिपी होती है। अगले नेविचार करके ही बोला था। आप ऐसा नहीं कह सकते चचा कि बिना विचारे बोल दिया था।

—तौ परिनाम की नायं सोची?

—इतना नहीं सोच पाते कि परिणाम क्या होगा। आज़ादी के बाद से अब तक के पैंसठ सालों में, ऐसा शानदार वक्तव्य हास्य कवियों के अतिरिक्त शायद किसीने न दिया होगा कि महंगाई बड़ी अच्छी चीज़ है।

—अरे कछू तौ होयौ करै है, जो नायं बोलनौ चइऐ!

—यस, हिज़ हाइनैस चचा! कुछ तो होता है, जो नहीं बोला जाना चाहिए। नहीं बोले जाने वाली बात जब बोल ही दी जाती है तो दूसरा अपराध होता है, उस परकायम रहना। बेनी प्रसाद जी ने वक्तव्य दिया है कि जो कुछ बोला उन्होंने सोच-समझ कर बोला है। टोलीनायक वक्तव्य दे देते हैं और सेनापति के लिएपरेशानी हो खड़ी हो जाती है। टोलीनायक किसान के पक्ष में बोल रहा है। तुम कर लो क्या करोगे। टोलीनायक भूल जाता है कि थाली किसान को भी नहीं मिलरही।

—बेनी परसाद ते ऊ ऊंचे लोग हतैं, जो बिना काई आधार के बोलैं।

—इसमें क्या शक! बैनी प्रसाद जी के पास के पास किसानों की भलाई का आधार था, लेकिन अफवाहें फैलाने वालों के पास कौन सा आधार है। चचा, सबसे तेज़रफ़्तार दौड़ने वाला अगर कोई तत्व है, प्रकाश से भी तेज़, ध्वनि से भी तेज़, तो वह अफ़वाह है। भोला इंसान उन्हें सच मान बैठता है और ज़िन्दगी से ही बैठजाता है। अफ़वाहों के आक़ा बिना परिणाम सोचे हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं होता कि उनके द्वारा कहा गया एक झूठ कितनेलोगों की जान ले सकता है। नॉर्थ-ईस्ट के शांत समझे जाने वाले नागरिकों के मन में कितनी नफ़रतें आ गई होंगी। युद्ध अपना रूप बदल रहा है। पाकिस्तान और भारत लड़ लेते थे। पैंसठ में लड़ लिए, इकहत्तर में लड़ लिए। उन लड़ाइयों में पाकिस्तान परास्त हुआ तो साइबर युद्ध छेड़ दिया। साइबर क्राइम ने अब युद्ध का रुख अख़्तियार कर लिया है। पाकिस्तान वेबसाइट्स के ज़रिए अफ़वाह फैला रहा है। हमारी सरकार के पास सबूत हैं कि विग्रह फैलाने और फूट डालनेका अधिकांश काम वहां से हो रहा है। ऐसी दो सौ वेबसाइटस बैन भी कर दी गई हैं।

—पतौ नायं सांति उनैं चौं नायं रास आवै?

—हिंसा रुग्ण दिमाग़ों को मज़ा देती है। हिंसा ललकारती है कि ख़ून और बहे। सामने वाला कब तक शांत रहेगा। निरीह, असहाय शांत रह सकते हैं, लेकिन उनकीहाय कभी भी हिंसक हो सकती है। उन्हें मालूम है कि हिंसा बहुत समय तक एकतरफा नहीं रहती। हिंसा हिंसा की जन्मदात्री होती है। उन हिंसाओं कोअलग-अलग जामे पहनाए जाते हैं। साम्प्रदायिकता, वर्चस्ववाद, वोट की राजनीति है। वोट डालने वाला और वोट पाने वाला, सबके सब इंसान हैं। मरती हैग़रीबियत है। कुल मिला कर नुकसान इंसानियत का होता है। बोलने वाले का क्या? बोल गया। बिना विचारे बोलने पर बिचारे की ही मौत होती है।

 


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