मुखपृष्ठ>
  • चौं रे चम्पू
  • >
  • बिना काम के दाम
  • बिना काम के दाम

    —चौं रे चम्पू! बगीची के खर्चा नायं चल रए, बता और का काम करैं?

    —स्विट्ज़रलैंड के नागरिक बन जाइए। काम करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। वहां की सरकार ने अपने नागरिकों के सामने प्रस्ताव रखा कि यदि वे चाहें, तो राजकीय कोष से, काम न करने पर भी एक लाख पिचहत्तर हज़ार रुपया, प्रति व्यक्ति प्रति माह मिल सकता है।

    —अरे, लल्ला एक लाख पिचत्तर हजार रुपइया में तौ पूरी बगीची पल जाएगी। तू हमैं भिजवाय दै।

    —चचा, आप उस कर्मशील देश में रहते हैं, जहां भाग्यवाद प्रबल है। अगर आपके भाग्य में लिखा होगा चचाजान, तो आपका स्विट्ज़रलैंड जाना कौन रोक सकता है ।

    —अरे, नायं लल्ला! हम भाग्य नायं मानैं। बगैर मैहनत कैसै जाय सकैं? व्हां की भासा सीखौ, तौर-तरीका सीखौ, तबई तौ! पर व्हां की सरकार इत्ती अमीर कैसै है गई?

    —अरे चचा, पूरी दुनिया के काले धन का इतना ब्याज इकट्ठा हो जाता है कि उन्हें कोई आर्थिक संकट है ही नहीं। पर वहां हुआ ये कि कम्प्यूटर क्रांति ने मानवीय श्रम को न्यूनतम कर दिया। जो काम आदमी करते थे कम्प्यूटरचालित मशीनें करने लगीं, तो एक नए तरह की बेरोज़ग़ारी फैली, जिसमें अर्थ-संकट नहीं था। सुंदर, साफ-सुथरा, प्रदूषणविहीन देश! हर आदमी के पास आधुनिक सुखपूर्ण जीवन की सारी सुविधाएं, फिर भी बिना काम मुफ़्त के दाम नहीं चाहते वहां के नागरिक। जनमत संग्रह में अस्सी प्रतिशत लोगों ने फोकट-फंड को अस्वीकार कर दिया। वे काम चाहते हैं और इसलिए चाहते हैं कि वहां मलूक दास जैसे कवि पैदा नहीं हुए। उन्होंने कहा था न ‘अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम, दास मलूका कह गए, सबके दाता राम’। काम न करने पर भी दाता राम सबको देंगे। आराम करो! आराम में भी राम छिपे हुए हैं।

    —लल्ला! हम सुटजरलैंड तो नायं जांगे, पर है सकै तो व्हां के निबासीन कूं हमाऔ सलाम भेद्दै। काम न करै तौ आदमी का काम कौ? हमाई बगीची पै सब छोरा-छोरी काम करिबे वारे हतैं। य्हां बेरोज़गारन्नै अपएं ताईं रुजग़ार पैदा किए ऐं। मलूक दास की बात में कोई मलूकाई नायं।

    wonderful comments!

    प्रातिक्रिया दे

    Receive news updates via email from this site