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भूल-ग़लती बैठी है जिरहबख़्तर पहन कर

भूल-ग़लती बैठी है जिरहबख़्तर पहन कर

 

—चौं रे चम्पू! ममतानासाही पै आगै कछू बतायगौ का?

—क्या बताऊं चचा! मुझे याद आ रही है मुक्तिबोध की एक कविता, ‘भूल-ग़लती’। भूल-ग़लती नामक शासक दिल के तख़्त पर जिरहबख़्तर पहनकर बैठा है। उसकी आंखें नुकीले तेज पत्थर सीचिलकती हैं

और सब क़तारें बेज़ुबां, बेबस सलाम में सिर झुकाए खड़ी हैं। जैसे ही ईमान को क़ैद करके लाया जाता है

और वह सुल्तानी निगाहों में निगाहें डालकर बेख़ौफ़ नीली बिजलियां फेंकता हैतो सब ख़ामोश खड़े देखते हैं। मनसबदार, शायर और सूफी, अलग़ज़ाली, इब्नेसिन्ना, अलबरूनी, आलिमोफ़ाज़िल, सिपहसालार, सब सरदार खामोश हैं। ममतानाशाही में ऐसा नहीं है। सहयोगी ख़ामोश नहीं हैं। एक-एक करके उनसे विमुख हो रहे हैं।

—कौन से सहयोगी बिमुख है रए ऐं रे?

—देखिए, तृणमूल कांग्रेस के सांसद और गायक सुमन कबीर, अभिनेता कौशिक सेन और एक शिक्षाशास्त्री सुनन्दा सान्याल ने ममता बनर्जी की निन्दा की है। ये सभी नन्दीग्राम, सिंगूर के मामले में उनके साथ थे। वामपंथी मोर्चे के विरुद्ध खड़े थे, अब ममता-विरोधी हो गए हैं। लेखक, बुद्धिजीवी विरोधी हो रहे हैं। ममता जी इस बात पर ध्यान दें कि मध्यवर्ग ही राजनीति चलाता रहा है। वोट भले ही ग़रीब डालता हो। कार्टून और व्यंग्य अभिव्यक्ति की आज़ादी के अंग हैं। किसी बड़े नेता पर अगर अधिक कार्टून बनते हैं तो यह उसके लिए सौभाग्य की बात होती है कि उसे कितना महत्व दिया जा रहा है। क्रोध और विरोध विपक्ष में बैठकर ही शोभा देता है।  हास्य और व्यंग्य की अभिव्यक्तियों के लिए सहनशीलता ही एक उत्तर है, डैमोक्रेसी में।

—एक कार्टून और ऊ तौ आयौ ऐ!

—हां उसमें कपड़े तो दीदी जैसे हैं, पर सिर ग़ायब है। अब मुझे याद आ रहा है ‘नेताजी की शिकार कथा’ का प्रसंग। एक नेताजी भेड़िए का शिकार करने गए। बहुत देर इंतज़ार किया पर भेड़ियामांद से नहीं निकला। उतावली में उन्होंने अपना शरीर मांद में घुसाया। निकले तो उनका सिर ही ग़ायब था। सहयोगी शिकारी देखकर हैरान रह गए। संशय में पड़ गए कि जब ये हमारे साथ आएथे, तब क्या सिर था? तय किया कि लोगों से पूछते हैं। अलग-अलग लोगों से पूछा। सबने लगभग यही कहा कि कभी ध्यान नहीं दिया कि सिर था या नहीं। हां, नेताजी की पत्नी ने ज़रूर कहा कि सिर था या नहीं था, यह तो मैं भी नहीं कह सकती, पर मैं उनके लिए खादी आश्रम से टोपियां ज़रूर लेकर आती थी। कहने का मकसद यही है चचा कि अगर कार्टूनिस्ट-व्यंग्यकार कहना चाहता है कि दिमाग़ से काम लो, तो उस कार्टून को हिंसक गतिविधि न समझा जाए। अभिव्यक्ति को आज़ादी दी जाए। ममता जी बेकार ही कलाकारों से युद्ध ठान बैठी हैं, कह रही हैं अपना अख़बारनिकालेंगी, अपनी चैनल चलाएंगी। अरे, व्यंग्य युद्ध का न्यौता नहीं होता।

—तौ फिर का ऐ?

—कुश्ती है, जैसे आपकी बगीची पर होती हैं। हार-जीत युद्ध में भी होती है और कुश्ती में भी। युद्ध में जीत तभी मिलती है, जब सामने वाले को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाए

अथवा परास्त करनेके बाद किसी भी रूप में दंडित किया जाए। कुश्ती में परास्त व्यक्ति सार्वजनिक रूप से

पराजित होना स्वीकर कर लेता है, लेकिन दंडित नहीं किया जाता। युद्ध जीवन-मरण का प्रश्न है और कुश्तीप्रश्न है सिर्फ़ और सिर्फ़ जीवन का। युद्ध की परिणति प्राणांत या जेल है,

कुश्ती की परिणति आपस का मेल है, क्योंकि कुश्ती एक खेल है। युद्ध सपाट होता है, व्यंग्य धोबीपाट मारता है।

कुश्ती मेंजीता हुआ पहलवान हारे हुए पहलवान को सहारा देकर उठाता है। हारने वाला पहलवान

अपनी धूल झाड़कर अपनी पराजय पर मुस्कराता है। मैंने तो चचा तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ताओं को एक सलाह और दे दी।

—सो का दई लल्ला?

—मैंने कहा कि ममता जी अब महान हो गई हैं, उन्हें अपनी मूर्तियां बनवाना शुरू कर देना चाहिए। माना कि मूर्तियां बनवाने पर चुनाव में पराजय का ख़तरा रहता है, लेकिन मूर्तियां कम से कम ग़ुस्सा तो नहीं करतीं। बदला तो नहीं लेतीं। आवाज़ पर अंकुश तो नहीं लगा सकतीं। मूर्तियां अगले चुनाव पर ढकी तो जा सकती हैं, पर शोभित रहीं तो अच्छेपन की याद ज़रूर दिलाएंगी। याददिलवाएंगी कि कुछ भी हो, दीदी ने रबीन्द्र सदन में मज़दूरों का मई दिवस तो मनवाया ही था।

 


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