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भ्रष्टाचार पावन पवित्र सांस्कृतिक विरासत

भ्रष्टाचार पावन पवित्र सांस्कृतिक विरासत

 

—चौं रे चम्पू! आजकल्ल साधू-सन्यासी भ्रस्टाचार के विरुद्ध मोर्चा खोले भए ऐं, सामाजिक कार्यकर्त्ता ऊ आगै आय रए ऐं, तैनैं का कियौ?

—चचा, मैंने तो छब्बीस साल पहले एक कविता लिखी थी, लगता है जैसे छब्बीस दिन पहले ही लिखी हो। धर्मयुग में छपी थी, ’अड़तीसवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव’। आजकल कहीं सुनाता हूं तो शीर्षक बताता हूं ’तिरसठवां राष्ट्रीय भ्रष्टाचार महोत्सव’, कविता लगभग वैसी की वैसी ही है।

—मैंनैं नायं सुनी!

—अरे चचा, आप अपने इस चम्पू को सिर्फ़ चम्पू ही समझते हैं! ख़ैर, ये कविता, और कविताओं की तरह एक झटके में नहीं लिखी गई थी। पूरा शोध किया गया था। आप इतना तो जानते ही हैं कि जब किसी कथात्मक कविता का विचार मेरे मन में आता है तो मुझे एक अदद समझदार श्रोता की ज़रूरत महसूस होती है। मुझे याद है कि इस कविता की बुनियाद एक रेलयात्रा में मरहूम कवि अग्निवेष शुक्ल के सामने रखी गई थी। फिर जयपुर में एक रात पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शंकर सरोलिया से भ्रष्टाचार के आंकड़े प्राप्त हुए। उसी रात रिश्वत-धन-प्राप्ति के चार स्वरूप निर्धारित हुए— नज़राना, शुकराना, हक़राना और ज़बराना। नज़राना, ये काम होने से पहले दिया जाने वाला ऑफ़र है और पूरी तरह से देने वाले की श्रद्धा और इच्छा पर निर्भर है। शुकराना, ये बतौर शुक्रिया दिया जाता है। इसमें लेने वाले को अचानक प्राप्ति के कारण बड़ा मज़ा आता है। हक़राना, यानी हक़ बनता है जनाब, बंधा-बंधाया हिसाब, आपसी सेटलमेंट, कहीं दस परसेंट, कहीं पन्द्रह परसेंट, कहीं ट्वैंटी परसेंट, कहीं फिफ्टी परसेंट, लेकिन पेमेंट से पहले पेमेंट। ज़बराना, यानी जबर्दस्ती पाना। ये देने वाले की नहीं, लेने वाले की इच्छा, क्षमता और शक्ति पर डिपेंड करता है। इसमें मना करने वाला मरता है।

—वा भई वा!

—किसी दिन पूरी कविता सुनाऊंगा। बहरहाल, इस अंतर्यामी भ्रष्टाचार का कहां-कहां पता लगाओगे? जब देने वाला राजी और लेने वाला राजी, तो क्या करेगा काजी! टेबल के नीचे, परदे के पीछे, संकेतों में, गुपचुप इशारों में लेन-देन की बात तय हो गई तो आप क्या कर लेंगे। इत्ते हमारे, इत्ते तुम्हारे! का कल्लेंगे अन्ना हजारे! क्या कर लेगा लोकपाल का बिल, जब लोग हैं इतने काबिल। भ्रष्टाचार हमारे देश की पावन पवित्र सांस्कृतिक विरासत बन गई है चचा!

—निदान बता चम्पू!

—निदान है संविधान में आस्था! आत्मशुद्धि, आत्ममंथन और मनुष्यता के संस्कार! मुझे तो बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर के उस भाषण की याद आती है जो उन्होंने नवंबर 1949 में नई दिल्ली में संविधान की प्रस्तावना में दिया था। उन्होंने कहा था कि एक संविधान चाहे जितना बुरा हो, वह अच्छा साबित हो सकता है, यदि उसका पालन करने वाले लोग अच्छे हों। इस पंक्ति से यह अर्थ भी निकलता है कि आप संविधान कितना भी अच्छे से अच्छा बना लो अगर उसको लागू करने वाले अच्छे नहीं हैं तो वो धरा बिराजेगा। लोकपाल बिल आए, ज़रूर आए, लेकिन संविधान को भी तो देखा जाए कि उसमें क्या-क्या उपाय पहले से ही निर्धारित हैं। जो कानून हमारे पास पहले से ही बने हुए हैं उन्हीं को अमल में लाना शुरू कर दिया जाए तो गिरे हुए लोगों के ग़िरेबान सुरक्षित नहीं रहेंगे। संविधान कानूनों का कानून है।

—कानून तौ अंधौ होय करै रे!

—विडम्बना ये है कि कानून अब अंधा नहीं है, एक धंधा है। धंधा इसलिए है, क्योंकि वह तबाही की नहीं, गवाही की मानता है। तबाही चीख-चीख कर कहेगी मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं! वह पूछेगा गवाही कहां है? गवाही कुछ बोले तो हम सिपाही भेजें। गवाही रंग बदलती रहती है। सिपाही भी रंग बदलते हैं। अब तो आन्दोलन भी रंग बदल रहे हैं। मंचों पर जो लोग दिखते हैं, उनके छिपे हुए प्रपंच भी दिखाई दे रहे हैं। नियम हैं, अधिनियम हैं, बिल हैं, अनुच्छेद हैं, लेकिन सबमें छेद हैं। कवि रमेश थानवी का एक शेर याद आ रहा है, ’टंगे फ्रेम में जड़े हुए हैं ब्रह्मचर्य के कड़े नियम, इसी फ्रेम के पीछे चिड़िया गर्भवती हो जाती है।’

 


 


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